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मार्च, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

आज पुरानी मिल गई (शानदार होली कविता)

आज पुरानी मिल गई (कविता) है! बहुत मजे की बात, कि आज पुरानी मिल गई बिना मिले की आस, हमे वो नजरों से ही रंग गई कहाँ न फिरते मारे-मारे, हम गलियां ओर चौबारे लिए गोद मे आज सयानी, बीच राह में मिल गई नखरे मर गए मीत नही, पहले वाली रीत नही है बोलो तो इठलाती नही है, उसी ढाल में ढल गई हम भी तो बेचैन हो गए,कुछ प्यासे नैना कर गई पहुंचे घर में पीछे-पीछे,समझे अब दाल गल गई अंदर आंगन बैठे साजन,करके सत्कार चली गई देकर गुजिया हाथ हमारे, प्यार से भैया कह गई हाय होली के ख्वाब सजाए, पानी-पानी कर गई जिस बच्ची को बेटी कहते, वो ही मामा कह गई -दुष्यंत 'बाबा' पुलिस लाईन, मुरादाबाद। मो 0-9758000057

आलंबन (कुंडलिया)

         आलंबन ( कुंडलिया ) आलंबन के रूप में , पत्नी रहे सामने हाथ भी लिखते नही , लगते है कांपने लगते है कांपने , सुर ताल कोई आत नही हास्य की कविता को , हँसकर सुनात नही सहमा सा बैठा रहत , गाते सकुचाय मन हरे - भरे मंच पर भी , पत्नी हो आलंबन -दुष्यंत 'बाबा' पुलिस लाईन, मुरादाबाद। मो0-9758000057

होली (कुंडलिया)

 होली (कुंडलिया) आये बौर से लद गए, आमों वाले बाग बीत गये दिन शीत के, स्वागत करता फ़ाग स्वागत करता फ़ाग, कहता आ गयी होली ढोल बजा नाचती, चौपाल बैठी टोली रंग अबीर गुलाल ले, सबको आज लगाएं रंगों से बढ़ता प्यार, चल पास शत्रु आये -दुष्यंत 'बाबा' पुलिस लाईन, मुरादाबाद। मो 0-9758000057

विरह की होली (फाग)

 विरह की होली इस होली साजन आ जाते, दिल के मैल मिटा लेती मैं।। उनको अपने रंग रंग लेती , या उनके रंग में रंग जाती मैं।। कैसे विरह की रतिया कटती, पिया बिना न सुहागिन लगती। अरे! सखी मांग में सिंदूर लगाते, उम्र भरको उनकी हो जाती मैं।। उनके नाम का सुमरिन करती, मीरा सी गलियों में मारी फिरती।। अरे! सखी विष प्याला दे जाते, अमृत समझ उसे पी जाती मैं।। मैं नलिनी हिम पात की मारी, विरह अग्नि जल हो गई कारी। अरे! सखी सिर आंचल दे जाते, फिर कली बन खिल जाती मैं।। हीरे-मोती मैं कभी नही माँगी, कभी न महल-दुमहला चाही। अरे! सखी कुछ मांग तो करते जान न्योछावर कर जाती मैं।। -दुष्यंत 'बाबा' पुलिस लाईन, मुरादाबाद।

बाल श्याम (कुंडलिया)

 बाल श्याम (कुंडलिया) चढ़ाय रंग सबको हरि, यशोदा मन हर्षाय पकरि-पकरि कर खींचती, बार-बार नहलाय बार-बार नहलाय, माखन दे-दे समझाय हँसत-खेलत श्याम को, नजर नही लग जाय मैया भई है बावरि, इतनी जानत नाय श्याम वर्ण है जन्म से, दूजो कौन चढ़ाय -दुष्यंत 'बाबा' पुलिस लाईन, मुरादाबाद। मो 0-9758000057

श्याम की होली (कुंडलिया)

 श्याम की होली (कुंडलिया) श्याम बनाऊं निज चित, राधा तुम्हें बनाऊँ होली खेलत मैं फिरू, कुंज गलिन विचराऊ कुंज गलिन विचराऊ, न बचे कोई नर-नारि प्रेम रंग की भर-भर कर, देउँ पिचकारि मारि गोपि-ग्वाल संग खेलूं, करके मन निष्काम श्याम रंग मोहि प्यारा, मेरे स्वामी श्याम -दुष्यंत 'बाबा' पुलिस लाईन, मुरादाबाद। मो 0-9758000057

चिरैया (निबंध)

         मैं जब कभी ये सोचता हूँ कि मैं रिश्वत नही लेता। फिर विचार करता हूँ कि क्या मैं ईमानदार हूँ? क्या रिश्वत न लेना ही ईमानदारी है तो मैं कहुँगा कि कदापि नही! हमें स्वंय को ईमानदार घोषित करने से पूर्व ईमानदारी के लिए जरूरी तत्वों का अध्यन करना नितान्त आवश्यक है। ईमानदार बनने के लिए आचरण की ईमानदारी, कर्तव्य के प्रति ईमानदारी के साथ दूसरों की स्वतंत्रता व स्वायत्ता को बनाये रखने की ईमानदारी पर भी ध्यान देना आवश्यक है।             यदि आज मैं 6, 7 या 8 घण्टे काम करके झउआ भर वेतन लेता हूँ। सभी राजकीय सुविधाओं तथा भत्तों का लाभ लेता हूँ, फिर भी मैं ईमानदार हूँ। तब मुझे उस मेहनती किसान की याद आती है जिस पृष्ठभूमि से मैं स्वयं निकलकर आया हूँ। यदि मैं ईमानदार हूँ तो फिर वह किसान क्या है, जो दिन-रात मेहनत कर अपनी फसल को तैयार करता है। जिसमें उसकी सभी क्रियाएं बुवाई, सिंचाई, निराई, गुढ़ाई, खाद, पानी इत्यादि क्रियाओं के साथ अपने बीस नाखूनों की कमाई सम्मिलित हैं तब फसल पककर तैयार होती है।             तैयार ...

विजिटिंग कार्ड (संस्मरण)

 संस्मरण ------ विजिटिंग कार्ड       साथियों! यह बात वर्ष 2015 की है जब मेरी तैनाती पुलिस उपमहानिरीक्षक कार्यालय मुरादाबाद परिक्षेत्र, मुरादाबाद में चल रही थी और पुलिस उप महानिरीक्षक के रूप में श्री ओंकार सिंह, भा0पु0से0 नियुक्त थे। तभी कुछ लोग अनौपचारिक भेंट हेतु महोदय से मिलने आये। संयोग से मैं भी वहीं बैठा कम्प्यूटर पर कुछ कार्य कर रहा था। मैं अपने कार्य के साथ-साथ उनकी बातों पर ध्यान दे रहा था। आगंतुक महोदय ने  हिंदी के प्रोफेसर के रूप में अपना परिचय दिया। साथ ही, अन्य आये लोंगो ने सेवानिवृत्त कैप्टन साहब के रूप में अपना परिचय दिया।            अन्य बहुत सी बातें हुई, जब जल-पान के बाद चलने का समय हुआ। तो महोदय भी सम्मान स्वरूप बाहर तक छोड़ने आये। उनके पीछे-पीछे मैं भी निकल आया और महोदय से निगाहें बचाते हुए, आगंतुक अतिथि प्रोफेसर साहब से यह कहते हुए कि ' मुझे भी हिंदी में मुझे भी बहुत रुचि है 'उनका सम्पर्क सूत्र मांग लिया। उन्होंने चलते-चलते अपना विजिटिंग कार्ड मेरे हाथ में थमा दिया। बात आयी-गयी हो गयी।        ...

कर्तव्य परायणता (लघुकथा)

 सोनल अभी छः साल की थी इस बार दीपावली त्योहार की बहुत उत्सुकता थी क्योंकि कॉलोनी के बच्चों में उसका घुलना-मिलना अभी कुछ दिन से ही हुआ था। वह बार-बार मम्मी से पूछ रही थी कि "मम्मी हमारे दिए और फुलझड़ी रॉकेट पापा इस बार इस बार तो लाएंगे" मम्मी बार-बार समझाती है कि "बेटा! पापा आते ही होंगे और उन्होंने मुझे बताया है कि तेरे लिए पटाखे भी खरीद लिए है" मोहल्ले में सभी बच्चों को पटाखे और फुलझड़ी जलाते देख सोनल से रहा नहीं जाता था इसलिए बार-बार मां को परेशान करती। मां ने गुस्से में एक-दो थप्पड़ भी सोनल को जड़ दिया।            'प्रदीप' (सोनल के पिता) जो कि पुलिस विभाग में ड्राइवर होने के कारण कप्तान साहब के साथ नियुक्त थे। पिछली बार भी दिवाली पर बच्चों में नही पहुँच सके। किन्तु पिछली दिवाली सोनल छोटी होने के कारण इतनी खुशी का आभास और ज़िद नही की थी। सोनल की ज़िद और प्यार में उसने साहब से हिम्मत जुटा कर कह भी दिया था कि "साहब इस बार शाम को टाइम से छोड़ दें तो हमारी भी दीपावली हो जाएगी" साहब ने भरोसा दिया कि शाम को समय से छोड़ देंगे।  ...

शत्रु कहूँ या मित्र (कविता)

            शत्रु कहूँ या मित्र वर्दी में एक प्रहरी, था ड्यूटी पर मुस्तैद सुनसान-वीरान में, जैसे कैदी कोई कैद दिल बहलाये किससे मन में नही विचार मन है प्रसन्न कभी, मन में आते विकार पीं-पीं करता कान पर दिखता नही चित्र कैसा यह भगवान ने साथी दिया विचित्र हाथ में डसने लगा इसे शत्रु कहूँ या मित्र खून तो पीते अक्सर, जो सच्चे होते मित्र ज्यों-ज्यों  रात्रि  घट रही समय रहा बीत करता था अटखेलियां सुना-सुना संगीत पेट लहू  से भर गया तब दिल जगा प्रीत रात्रिचर स्टाफ बता ये लगा मिलाने मीत पो फटने से सूर्य का स्वागत करे प्रभास निशा विदाई लेने लगी होने लगा प्रभात प्रहरी मित्र जाते देख मच्छर हुआ उदास मित्र ने ताली से दिया मुक्ति का आभास @पूर्णतः स्वरचित -दुष्यन्त 'बाबा' पुलिस लाईन, मुरादाबाद। दिनांक- 17-11-20

कहीं भी गोविंद (कहानी)

 कहानी- कहीं भी गोविंद यह बात नवंबर महीने की है हम सभी मित्रों के साथ मिलकर कार से गोवर्धन परिक्रमा लगाने वृंदावन जा रहे थे। हमारी कार मुरादाबाद से चलकर लगभग 85 किलोमीटर ही पहुंची होगी कि नरौरा पुल से कुछ पहले ही लड़खड़ाते हुए उसका एक पहिया निकल गया। हमें पहिया तो मिल गया परन्तु उसके नट/बोल्ट नही मिल सके। उन्हें खोजने का सभी मित्रों ने मिलकर भरसक प्रयास किया। लेकिन परिणाम अभी शून्य था। सभी मित्र बड़े चिंतित थे शाम होने जा रही थी इसलिए बहुत गुस्सा भी आ रहा था। इधर कोई दुकान भी दूर-दूर तक नही थी कार को देखकर एक मंदबुद्धि लड़का जिसकी उम्र लगभग 13 साल रही होगी, आ गया। बार-बार इशारे से कुछ इंगित करता। हम लोग पहले से ही बहुत परेशान हो चुके थे, उसकी बातें हमे और भी क्रोधित कर रही थी। हम भी हार थककर सड़क के नीचे घास पर जा बैठे। वह फिर भी कुछ कहता रहा। जब दिमाग कुछ शांत हुआ तो हमारे एक भगत जी मित्र ने कहा कि जब सारे प्रयास विफल हो ही गए है तो एक बार इसकी भी सुन लो, क्या पता गोविंद इसी रूप में आये हों। हमने उसका उपहास उड़ाते हुए कहा "ये तेरा भाई है जो कुम्भ के मेले में तुझसे विछड़ गया था, जा तू...

नीड़ के लिए (कविता)

 कविता- नीड़ के लिए हर शख्स बेचैन था नीड़ के लिए। भीड़ ही भाग रही थी भीड़ के लिए।।  तूफानों से सामना तो हर रोज होता था। हर रोज खोकर ही कुछ रोज पाता था।। क्या कमाया, क्या गंवाया समझ नहीं आता था।  हां! सोने से पहले पेट तो जरूर भर जाता था।।    जीवन में समय की कमी ही कमी थी।  मां से भी बात होती कभी ही कभी थी।।   समय की कमी से अब घर टूटने लगे थे।   पति से पत्नी, पत्नियों से पति छूटने लगे थे।।           आशंका की आहट थी और सन्नाटा छा गया।         कुछ समझने से पहले ही कोरोना आ गया।।         आपदा ऐसी कि अब लॉक डाउन तो जरूरी था।         जीने के लिए घरों में अब बंद रहना मजबूरी था।।          देखते ही देखते जीने की फिजाएं बदल गयीं। नदियों का पानी, शहर की हवाएं बदल गयीं।। पशु-पक्षियों के रहने की अब अदाएं बदल गयीं। बहुसंख्यक शहरों की अब संख्याएं बदल गयीं।।          जो कभी इस शहर को अपने पसीने से सींचते थे।     ...

बेजुबानों की ममता (कहानी)

  बेजुबानों की ममता मुझे याद है कि वह भाद्रपद महीने की रात थी मैं घेर पर सोया था उस रात बहुत तेज बारिश हो रही थी। रात के करीब दस बजे होंगे कि सहसा एक कुतिया आकर मेरी चादर खींच रही थी और तेज-तेज भौंख रही थी। मानो वह मुझसे कुछ कहना चाह रही हो, मैंने उसे कई बार डांटा कि "कलईया न मानेगी बहुत मारूंगा भाग..हट्ट..हट्ट" मुझसे उसका सिर्फ इतना रिश्ता था कि जब भी मैं घर से खाना खाकर घेर के लिए निकलता था। एक रोटी हाथ में दबा लाता था। वही रोटी आकर उस कुतिया को डाल देता था। काला रंग होने के नाते 'कलईया' नाम भी मैने ही उसे दिया था। वह बार-बार भगाने के बाद भी नही भाग रही थी उसके बहुत परेशान करने से मेरी नींद तो भाग ही चुकी थी। सहसा मेरे मन में विचार आया की इसे कोई परेशानी है मैने उससे पूछा "बता क्या बात है कलईया" वह आऊँ..आऊँ करती सड़क की ओर चलने लगी शायद मुझे कहीं ले जाना चाहती थी। मैने छाता और टार्च उठायी और उसके पीछे-पीछे चल दिया। चलते-चलते गांव के मध्य मुख्य सड़क पर ले आयी जहाँ बेल का एक पेड़ था। वहाँ रुक गयी और फिर से आऊँ..आऊँ..करने लगी मैने पेड़ की जड़ में टार्च की रोशनी क...

गांधी जी के आत्मीय (कहानी)

  गांधी जी के आत्मीय   भोलाराम की पत्नी एक दुर्घटना में कंधे की हड्डी फेक्चर हो गई सो कार्य की विवशता और छोटे बच्चे की देख-रेख के लिए पत्नी को बच्चों सहित ससुराल छोड़ना पड़ा। चूँकि नौकरी भी जरूरी थी इतनी छुट्टियां मिल पाना भी कठिन था इसलिए शनिवार की शाम को ससुराल खुद भी पहुंच जाते थे। सोमवार की सुबह फिर से ड्यूटी पहुँच जाते थे।          आज सोमवार का ही दिन है, सुबह-सुबह कोहरा भी बहुत अधिक था । भोलाराम ऑफिस की तैयारी कर रहे थे। सासु मां भोला के लिए साथ ले जाने हेतु भोजन तैयार कर रही हैं। पत्नी चोट के कारण असहाय सी बिस्तर पर बैठी थी। अचानक किसी ने आवाज दी। किंतु भोला वह आवाज न सुन पाएं थे। "राजू...राजू..उठ के नीचे जा" सासु मां ने रसोई से आवाज दी। चूँकि सालें साहब अभी सोकर नही उठे थे। अबाज सुनकर भोला रसोई के ओर भागे और पूछा "क्या बात है कैसे आवाज दे रहीं हैं"। "कुछ नही...आपके करने लायक कोई काम नही है" सासु मां ने उत्तर दिया। इधर पत्नी ने बिस्तर से आवाज दी "क्या बात है मम्मी.. मुझे बताओ, राजू तो अभी सो रहा है"। "नही..बिंदिया.. तुमसे नही होगा...

आओ खुलकर जियें (कविता)

आज अहवाव में घुटन ही घुटन है क्यों इस घुटन में घुटें। अब मिलने का तरीका बदल दें सबसे मुस्कुरा कर मिलें।। आओ जीने तरीका बदल दें आज फिर खुलकर जियें। कॉफी चाय या अंगूर की बेटी आओ साथ बैठकर पियें।। हम सुनहरे कल की चाह में दुनिया की भीड़ में खो गए। कल एम.ए. किया नौकरी लगाई पेंशन खाकर मर गए।। जमाने को फिक्र नही हमारी तो उसकी क्यों चिंता करें। कॉफी चाय या अंगूर की बेटी आओ साथ बैठकर पियें।। जो साथ है नौकरी में छोड़ कर तनहा कभी चले जाएंगे। बहुत याद आएंगे ये लोग जब बच्चे भी पराये हो जाएंगे।। खुद के लिए भी तो जिएं क्यों हमेशा हम उनके लिए मरें। कॉफी चाय या अंगूर की बेटी आओ साथ बैठकर पियें।। एक खुली छत हो उस पर हो घुमड़ते बादलों का साया। वही पीपल हो चौपाल हो बेशक हो पिलखन की छाया।। वो बच्चों सी बातें करें आज फिर से अपना बचपन जिये। कॉफी चाय या अंगूर की बेटी आओ साथ बैठकर पियें।। फिर से दोस्तों की मंडली जिसमें हमारे मन का मीत हो। भंवरों की गुनगुनाहट में प्राकृति की हवाओं का गीत हो।। हंसे बिना गुजरा जमाना आओ फिर से ठहाकों में हंसें। कॉफी चाय या अंगूर की बेटी आओ साथ बैठकर पियें।। फिर से बागों में बैठें फूल...

व्यथित (विचारों का मानवीकरण)

 लेखनी बोली एक दिन होकर बहुत उदास मेरे लिखने का मन नही अब कोई बकवास बड़े-बड़े आंदोलन और मोमबत्ती की आस बलात्कारियों की जकड़ में आती नही सांस कागज से कब रहा गया वह भी कूदा जाय मुझको गन्दा कर रहे कोई और नही उपाय कुत्ता बनकर नौचता मनुज-मनुज को खाय छोड़ो 'बाबा' मुझको असलहा लेओ उठाय बुद्धि तैस में आ गयी जागा निज स्वाभिमान मनुज-मनुज अब रहा नही,बना हुआ हैवान अबला कहाँ सुरक्षित अब गली-गली शैतान ऐसे दरिद्र समाज को अब निपटा दो भगवान हृदय भी रोने लगा कोई शब्द नही अब शेष मासूम सी वो पीड़िता बनी मिट्टी के अवशेष राजनीति के कीटों का ये अवसर था विशेष कभी बेटे को दुत्कार नही बलात्कारी से द्वेष 'बाबा' तब कहने लगे सुनकर करुण चीत्कार! बलात्कारी को मौत हो, ठरकी का तिरस्कार दुर्घटना को बचा सकें तो सैनिक सा सत्कार मन में हो नारी सम्मान, तो हो सकता उद्धार दुष्यंत 'बाबा' एम.ए. संस्कृत, हिंदी (नेट) पुलिस लाईन, मुरादाबाद सम्पर्क- 9758000057