शत्रु कहूँ या मित्र (कविता)
शत्रु कहूँ या मित्र
वर्दी में एक प्रहरी, था ड्यूटी पर मुस्तैद
सुनसान-वीरान में, जैसे कैदी कोई कैद
दिल बहलाये किससे मन में नही विचार
मन है प्रसन्न कभी, मन में आते विकार
पीं-पीं करता कान पर दिखता नही चित्र
कैसा यह भगवान ने साथी दिया विचित्र
हाथ में डसने लगा इसे शत्रु कहूँ या मित्र
खून तो पीते अक्सर, जो सच्चे होते मित्र
ज्यों-ज्यों रात्रि घट रही समय रहा बीत
करता था अटखेलियां सुना-सुना संगीत
पेट लहू से भर गया तब दिल जगा प्रीत
रात्रिचर स्टाफ बता ये लगा मिलाने मीत
पो फटने से सूर्य का स्वागत करे प्रभास
निशा विदाई लेने लगी होने लगा प्रभात
प्रहरी मित्र जाते देख मच्छर हुआ उदास
मित्र ने ताली से दिया मुक्ति का आभास
@पूर्णतः स्वरचित
-दुष्यन्त 'बाबा'
पुलिस लाईन, मुरादाबाद।
दिनांक-17-11-20
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