आओ खुलकर जियें (कविता)

आज अहवाव में घुटन ही घुटन है क्यों इस घुटन में घुटें।

अब मिलने का तरीका बदल दें सबसे मुस्कुरा कर मिलें।।

आओ जीने तरीका बदल दें आज फिर खुलकर जियें।

कॉफी चाय या अंगूर की बेटी आओ साथ बैठकर पियें।।


हम सुनहरे कल की चाह में दुनिया की भीड़ में खो गए।

कल एम.ए. किया नौकरी लगाई पेंशन खाकर मर गए।।

जमाने को फिक्र नही हमारी तो उसकी क्यों चिंता करें।

कॉफी चाय या अंगूर की बेटी आओ साथ बैठकर पियें।।


जो साथ है नौकरी में छोड़ कर तनहा कभी चले जाएंगे।

बहुत याद आएंगे ये लोग जब बच्चे भी पराये हो जाएंगे।।

खुद के लिए भी तो जिएं क्यों हमेशा हम उनके लिए मरें।

कॉफी चाय या अंगूर की बेटी आओ साथ बैठकर पियें।।


एक खुली छत हो उस पर हो घुमड़ते बादलों का साया।

वही पीपल हो चौपाल हो बेशक हो पिलखन की छाया।।

वो बच्चों सी बातें करें आज फिर से अपना बचपन जिये।

कॉफी चाय या अंगूर की बेटी आओ साथ बैठकर पियें।।


फिर से दोस्तों की मंडली जिसमें हमारे मन का मीत हो।

भंवरों की गुनगुनाहट में प्राकृति की हवाओं का गीत हो।।

हंसे बिना गुजरा जमाना आओ फिर से ठहाकों में हंसें।

कॉफी चाय या अंगूर की बेटी आओ साथ बैठकर पियें।।


फिर से बागों में बैठें फूलों पर इठलाती तितली को चुनें।

शेरो-शायरी गजल या पुरानी कहानी को गप्पों में सुनें।।

यहाँ गुमनाम अंधेरे ही अंधेरे हैं क्यों इन अंधेरों में जियें। 

कॉफी चाय या अंगूर की बेटी आओ साथ बैठकर पियें।।

@पूर्णतः स्वरचित
        -दुष्यंत "बाबा"
   पुलिस लाईन, मुरादाबाद।
   मो0-9758000057


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