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विवाह मंगल गीत-बन्ना

मेरो बन्ना बड़ो अनाड़ी गुजरिया छुप-छुप देखे रे!!! जेठ महीना गर्मी आवें  झलें बीझना जल भर लावे चदरिया हल्की ताने रे!! मेरो बन्ना बड़ो अनाड़ी गुजरिया छुप-छुप देखे रे!!! सावन-भादों झर लग जावें झींगा बोलें दादुर गावें पंखुरियाँ उड़-उड़ आवें रे!! मेरो बन्ना बड़ो अनाड़ी गुजरिया छुप-छुप देखे रे!!! पूस-माघ जब सर्दी आवें चल पुरवैया हाड़ कँपावे रजइया छोटी लावे रे!!! मेरो बन्ना बड़ो अनाड़ी गुजरिया छुप-छुप देखे रे!!! बसन्त आय फागुन जो आवे मादक-मादक फ़ाग सुनावे अरे-रे वो तो लाड़-लड़ावे रे!! मेरो बन्ना बड़ो अनाड़ी गुजरिया छुप-छुप देखे रे!!! -दुष्यन्त 'बाबा' पुलिस लाईन, मुरादाबाद *भावार्थ*- इस गीत को समझने से पहले बन्ना शब्द का अर्थ समझना आवश्यक है विवाह के समय किसी स्त्री/पुरूष के  हाथ या पैर में कंकन (नवग्रह की प्रतीक पीली सरसों, कोड़ी, लोहा, सुपारी आदि का नौ वस्तुओं समुच्चय) बांध दिया जाता है उसे बांधे जाने के बाद व खोले जाने से पूर्व की स्थिति तक व्यक्ति को बन्ना कहते है। ऐसा ही कोई बन्ना अपनी नवोड़ा के साथ है और जेठ का महीना आ चुका है वह अपनी सजनी के लिए ठंडा पानी भी लाकर देता है बीझना (हाथ का पंखा) से ह...

विवाह मंगल गीत-बन्नो

बन्नी तोय ऐसौ मिले भरतार सजल दिन नैनन राखे रे!!! भोर भये जब दिन चढ़ आवे तौते पहले वो उठ जावे हाथ चाय लेई तोय जगावे अंक भरे फिर तोय पिलावे अरे! अखियन बरसे प्यार सजल दिन नैनन राखे रे!!! पनिया भरन तू पनघट जावै ननद बेचारी राह निहारे सखी-सहेली के सम जानै दो-दो गगरी खुद भर लावै अरे! तोय छुए न जल धार सजल दिन नैनन राखे रे!!! चौका चूल्हे जब हाथ लगावै माई बने तेरी सासु आवै  वोई पवे और तोय खवावै चूल्हे आंच से तोय बचावै अरे! तेरी करे बीझना बियार सजल दिन नैनन राखे रे!!! गोबर-कूरे जब जाना चाहे धरें परात ससुर जी आवै घूघंट काढ़े न लाज लजावै बेटी के सम मान वो वारै अरे! गइयन की काढ़े धार सजल दिन नैनन राखे रे!!! बन्नी तोय ऐसौ मिले भरतार सजल दिन नैनन राखे रे!!!