विरह की होली (फाग)

 विरह की होली

इस होली साजन आ जाते,

दिल के मैल मिटा लेती मैं।।

उनको अपने रंग रंग लेती ,

या उनके रंग में रंग जाती मैं।।


कैसे विरह की रतिया कटती,

पिया बिना न सुहागिन लगती।

अरे! सखी मांग में सिंदूर लगाते,

उम्र भरको उनकी हो जाती मैं।।


उनके नाम का सुमरिन करती,

मीरा सी गलियों में मारी फिरती।।

अरे! सखी विष प्याला दे जाते,

अमृत समझ उसे पी जाती मैं।।


मैं नलिनी हिम पात की मारी,

विरह अग्नि जल हो गई कारी।

अरे! सखी सिर आंचल दे जाते,

फिर कली बन खिल जाती मैं।।


हीरे-मोती मैं कभी नही माँगी,

कभी न महल-दुमहला चाही।

अरे! सखी कुछ मांग तो करते

जान न्योछावर कर जाती मैं।।

-दुष्यंत 'बाबा'

पुलिस लाईन, मुरादाबाद।

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