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गनर यज्ञ (हास्य-व्यंग)

      बड़े-बड़े शहर के बड़े परिवारों को घर के लिए काम वाली बाई खोजना जितना दुष्कर कार्य है उतना ही कठिन कार्य है उसे लंबे समय तक रोकना, मजाल क्या है कि कभी उसकी पगार में देरी कर दें या किसी त्योहार पर बोनस न भी दें। आज-कल बाई पर निर्भरता इस कदर बढ़ चुकी है कि एक दिन न आये तो खाना-खाने के लिये भी घर से बाहर जाना पड़े। इसलिए उसकी प्रत्येक समस्या का ध्यान घर के सदस्यों की आवश्यक्ताओं से अधिक रखा जाता है। यह तो हुई स्त्री वर्ग की एक समस्या।        अब ऐसी ही एक समस्या इस समाज के पुरुष वर्ग की भी है। आज पैसा है, बंगला है, गाड़ियां हैं, बड़े अधिकारियों और नेताओं में उठा-बैठ है पर कहीं न कही शेडो/गनर न होने की टीस दिखाई देती है। टीस हो भी क्यों नही! कितनी महंगी गाड़ी हो या ऊंची-ऊंची पार्टियों में शिरकत हो बिना गनर के बात जमती नही, लोग उसे ही अधिक तबज्जो देते है जिसके साथ पुलिस विभाग से मिला गनर चल रहा हो। इसलिए गनर प्राप्त करने का एक चलन सा चल गया है। कुछ महत्वपूर्ण व्यक्तियों को उनके जीवन भय या प्रोटोकॉल के लिए आवश्यक सुरक्षा के रूप गनर/बल प्रदान किया जाता है परन्तु ...

दादी की कहानी-बाल कविता

 दादी! सुनाओ ऐसी कहानी जिसमें हो परियों की  रानी या हो  पुरानी सदियों वाली बूढ़ी  परी या नदियों  वाली तब दादी की छनकी पायल और कहा  परी  थी  घायल सुंदर  परियां  उड़कर जाती कह जाती थी उससे पागल किंतु समय  सभी का आया एक का होकर रुक  न पाया एक  दैत्य  साधु  बन  आया सबसे अपना रहस्य छिपाया सम्मोहन का जाल बिछाकर सुंदर  परियों को  ललचाकर समझकर परियां  नई-नवेली करता था मनभर  अठखेली पहचान न  पाते उसका  वेश परियां ले  जाता  अपने  देश पर बूढ़ी परी ये जान गयी थी उसके छल  पहचान गयी थी छड़ी जादू की वह  ले आयी जो  थी उसने नानी से  पायी छड़ी घुमाकर जो मारा मंतर भस्म हो गया  दानव तत्क्षण ये नन्ही परियां सोच रहीं  थीं खुद को मन में कोस रही थी आशीष  सदा बड़ों से पाते हैं धोखे छल से बच ही  जाते हैं *-©दुष्यन्त 'बाबा'* पुलिस लाईन, मुरादाबाद।