कर्तव्य परायणता (लघुकथा)

 सोनल अभी छः साल की थी इस बार दीपावली त्योहार की बहुत उत्सुकता थी क्योंकि कॉलोनी के बच्चों में उसका घुलना-मिलना अभी कुछ दिन से ही हुआ था। वह बार-बार मम्मी से पूछ रही थी कि "मम्मी हमारे दिए और फुलझड़ी रॉकेट पापा इस बार इस बार तो लाएंगे" मम्मी बार-बार समझाती है कि "बेटा! पापा आते ही होंगे और उन्होंने मुझे बताया है कि तेरे लिए पटाखे भी खरीद लिए है" मोहल्ले में सभी बच्चों को पटाखे और फुलझड़ी जलाते देख सोनल से रहा नहीं जाता था इसलिए बार-बार मां को परेशान करती। मां ने गुस्से में एक-दो थप्पड़ भी सोनल को जड़ दिया। 

          'प्रदीप' (सोनल के पिता) जो कि पुलिस विभाग में ड्राइवर होने के कारण कप्तान साहब के साथ नियुक्त थे। पिछली बार भी दिवाली पर बच्चों में नही पहुँच सके। किन्तु पिछली दिवाली सोनल छोटी होने के कारण इतनी खुशी का आभास और ज़िद नही की थी। सोनल की ज़िद और प्यार में उसने साहब से हिम्मत जुटा कर कह भी दिया था कि "साहब इस बार शाम को टाइम से छोड़ दें तो हमारी भी दीपावली हो जाएगी" साहब ने भरोसा दिया कि शाम को समय से छोड़ देंगे।
          दोपहर में साहब डाक बंगला गए थे वही साहब को मीटिंग में छोड़कर प्रदीप को समय कुछ मिला तो उसने डाक बंगले के बाहर से कुछ दिये और छोटे-छोटे कुछ पटाखे फुलझड़ी आदि खरीद लिए। खुशी-ख़ुशी गाड़ी में रख लिए। साहब के आवास पहुंचकर शाम होते ही वह आदेश का इंतजार करने लगा। क्योंकि साहब ने लगभग 7:30 बजे घर जाने का आश्वासन दे दिया था।
           घड़ी में 7:30 बजे थे। प्रदीप जैसे ही बाइक में समान रखकर घर की ओर चला ही था कि फिर से फोन की घंटी बजी के "जल्दी आओ अर्जेंट जाना है" प्रदीप पटाखे और दिए बाइक में छोड़कर ही साहब के पास आया साहब ने बताया कि "दीपावली को लेकर दो समुदायों में कहानी कहासुनी हो गई है मामला संवेदनशील हो सकता है तत्काल चलना होगा" प्रदीप थोड़ा दुःखी था फिर गाड़ी लेकर साहब को बैठाकर घटनास्थल की ओर चल दिया। मन में घर जाने की उत्सुकता थी और बेटी का ख्याल भी परंतु इस बार भी उसकी दीपावली नहीं हो सकी।
           घटनास्थल से वापसी होते समय मध्यरात्रि का 1:00 बज चुका था।  अब सोनल भी अपने पापा के इंतजार में सो चुकी थी। प्रदीप अपने घर पर पहुंचा तो सभी के घरों में लगे दियों का तेल खत्म हो चुका था और मोमबत्तियां अपने अंतिम पड़ाव में थी। मोमबत्तियों का पिघलता हुआ मोम मानो सोनल के रोते हुए आँसुओं को प्रदर्शित कर रहा हो। प्रदीप ने ख़ुशी-ख़ुशी पटाखे और दिये दीवाली के अगले दिन जलाने का प्रण किया। वस्तुतः प्रदीप की कर्तव्य परायणता आज सोनल के आँसुओ पर भारी थी।

@पूर्णतः स्वरचित
-दुष्यंत 'बाबा'
पुलिस लाईन, मुरादाबाद।
मो0 9758000057

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