बेजुबानों की ममता (कहानी)

  बेजुबानों की ममता

मुझे याद है कि वह भाद्रपद महीने की रात थी मैं घेर पर सोया था उस रात बहुत तेज बारिश हो रही थी। रात के करीब दस बजे होंगे कि सहसा एक कुतिया आकर मेरी चादर खींच रही थी और तेज-तेज भौंख रही थी। मानो वह मुझसे कुछ कहना चाह रही हो, मैंने उसे कई बार डांटा कि "कलईया न मानेगी बहुत मारूंगा भाग..हट्ट..हट्ट" मुझसे उसका सिर्फ इतना रिश्ता था कि जब भी मैं घर से खाना खाकर घेर के लिए निकलता था। एक रोटी हाथ में दबा लाता था। वही रोटी आकर उस कुतिया को डाल देता था। काला रंग होने के नाते 'कलईया' नाम भी मैने ही उसे दिया था। वह बार-बार भगाने के बाद भी नही भाग रही थी उसके बहुत परेशान करने से मेरी नींद तो भाग ही चुकी थी। सहसा मेरे मन में विचार आया की इसे कोई परेशानी है मैने उससे पूछा "बता क्या बात है कलईया" वह आऊँ..आऊँ करती सड़क की ओर चलने लगी शायद मुझे कहीं ले जाना चाहती थी। मैने छाता और टार्च उठायी और उसके पीछे-पीछे चल दिया। चलते-चलते गांव के मध्य मुख्य सड़क पर ले आयी जहाँ बेल का एक पेड़ था। वहाँ रुक गयी और फिर से आऊँ..आऊँ..करने लगी मैने पेड़ की जड़ में टार्च की रोशनी की तो देखा कि उसके पांच नवजात पिल्ले एक-दूसरे से चिपके पड़े थे। बारिश के पानी का स्तर अब इतना बढ़ चुका था की लहरें उन्हें छूकर जाती थी। ये दृश्य देख मेरी आंखों से आँसू निकल पड़े। शायद! कुछ देर और हो जाती तो वह नवजात अनायास ही पानी में वह जाते। मैने अपनी ओढ़ी हुई चादर उतारी और उसमें पांचों पिल्ले रखे और घेर में ले आया। कलईया बच्चों को सुरक्षित पाकर आऊँ...आऊँ कर पूँछ हिलाती मेरे पांव चूम रही थी। शायद मेरी प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर रही हो। उस दिन मुझे लगा की मां की ममता क्या होती है और दूसरा ये बेजुबान भी हमसे कुछ आशा रखते है। आवश्यकता है इन्हें समझने की और इनके दुख-दर्द साझा करने की।...धन्यवाद

@पूर्णतः स्वरचित
-दुष्यंत 'बाबा'
पुलिस लाईन, मुरादाबाद।
दिनांक-23-12-2020

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