कहीं भी गोविंद (कहानी)
कहानी- कहीं भी गोविंद
यह बात नवंबर महीने की है हम सभी मित्रों के साथ मिलकर कार से गोवर्धन परिक्रमा लगाने वृंदावन जा रहे थे। हमारी कार मुरादाबाद से चलकर लगभग 85 किलोमीटर ही पहुंची होगी कि नरौरा पुल से कुछ पहले ही लड़खड़ाते हुए उसका एक पहिया निकल गया। हमें पहिया तो मिल गया परन्तु उसके नट/बोल्ट नही मिल सके। उन्हें खोजने का सभी मित्रों ने मिलकर भरसक प्रयास किया। लेकिन परिणाम अभी शून्य था। सभी मित्र बड़े चिंतित थे शाम होने जा रही थी इसलिए बहुत गुस्सा भी आ रहा था। इधर कोई दुकान भी दूर-दूर तक नही थी कार को देखकर एक मंदबुद्धि लड़का जिसकी उम्र लगभग 13 साल रही होगी, आ गया। बार-बार इशारे से कुछ इंगित करता। हम लोग पहले से ही बहुत परेशान हो चुके थे, उसकी बातें हमे और भी क्रोधित कर रही थी। हम भी हार थककर सड़क के नीचे घास पर जा बैठे। वह फिर भी कुछ कहता रहा। जब दिमाग कुछ शांत हुआ तो हमारे एक भगत जी मित्र ने कहा कि जब सारे प्रयास विफल हो ही गए है तो एक बार इसकी भी सुन लो, क्या पता गोविंद इसी रूप में आये हों। हमने उसका उपहास उड़ाते हुए कहा "ये तेरा भाई है जो कुम्भ के मेले में तुझसे विछड़ गया था, जा तू ही समझ सकता है इसकी बात को" भगत जी उठे और उन्होंने गाड़ी से हमारे बचे हुए चिप्स/बिस्किट/पानी निकाला और उस बच्चे को जाकर दिया। उसके ऊपर से दुर्गंध आ रही थी फिर भी भगत जी उसे अपने साथ गाड़ी के पास ले आये और उसके इशारों से प्राप्त अनुपालन करते हुए आगे के पहिए से 2-2 नट खोल लिए दो पहियो के चार नट हो गए। जो एक पहिए के नटों की पर्याप्त संख्या थी। जल्दी से सभी ने मिलकर पहिया लगाया और कार में सवार हो गंतव्य को निकल पड़े। अलीगढ़ पहुँचने पर नए नट खरीदकर शेष पहियों की पूर्ति कर दी। तब सभी के मुँह से एक स्वर में निकला की गोविंद कहीं भी मिल सकते है। और बार-बार उस मंदबुद्धि बच्चे का धन्यवाद कर रहे थे।
धन्यवाद!
@स्वरचित
लेखक-दुष्यंत 'बाबा'
पुलिस लाईन, मुरादाबाद।
मो0-9758000057
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