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आह! (कविता)

       आह! शायद! तुम   माली बन न   सकीं इसलिए मैं सुमन सा खिला नही मिलता पोषण   मन   के   जल से वह   पोषण   मुझको   मिला   नही न सुगन्ध   भरी मन अंतस   में ही इसलिए पवनों संग   मैं वहा नही मुझे एक ही मिला   रब से जीवन कर   दिया नाम तुम्हारे ही अर्पण फिरभी क्यों सब छूटा सा लगता सोचो तो अधीर   टूटने   लगता है एक हूक सी उर   में उठ आती है आंखों में तिमिर सा छा जाता है होकर   संचारित रक्त शिराओं में तन-मन   कम्पित कर   जाता   है                       -दुष्यंत 'बाबा'                          पुलिस लाईन, मुरादाबाद।                    ...

विश्वास का प्रायश्चित (कहानी)

                बलराम सिंह सेवानिवृत्ति के बाद कार्यालय स्टाफ से विदाई ले रहे थे, सामान का ट्रक घर जाने के लिए तैयार खड़ा था। मन ही मन सोच रहे थे कि घर से लाए ही क्या थे! सिपाही की नौकरी लगी थी तो घरवालों ने एक पुराना खादी का लिहाफ और एक पुराना सा गद्दा सीमेंट के कट्टे में बांध कर दे दिया था। आज पूरा घर सामान से भरा है और एक ट्रक यह भी, सामान रखने तक की भी जगह नहीं है।          खुशी खुशी विदाई ली घर पहुंचे बाहर से ही आवाज लगाई "अरे! शीला यह सामान उतरवा लो" शीला सामान उतरवाने में लग गई तब तक रजनी पानी का गिलास लेकर बलराम के सामने उपस्थित हो गई "बाबूजी पानी लीजिए"। रजनी जो कि बलराम के पुत्र बंसल की पत्नी है। बलराम रजनी के सेवाभाव से ओतप्रोत आज खुद को बड़ा गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। शहर का सबसे प्रतिष्ठित कॉलोनी में टी-पॉइंट पर 220 वर्ग मीटर में मकान है। बलराम ने शाम को ही पेंटर को बुलाया और घर के बाहर लगी नेम प्लेट पर लिखे पुलिस उपाधीक्षक शब्द के आगे छोटा सा 'से0नि0' लिखवा दिया। अगले ही दिन बेटे की फ्लाइट थी उसको अमेरिका ज...