विजिटिंग कार्ड (संस्मरण)
संस्मरण ------
विजिटिंग कार्ड
साथियों! यह बात वर्ष 2015 की है जब मेरी तैनाती पुलिस उपमहानिरीक्षक कार्यालय मुरादाबाद परिक्षेत्र, मुरादाबाद में चल रही थी और पुलिस उप महानिरीक्षक के रूप में श्री ओंकार सिंह, भा0पु0से0 नियुक्त थे। तभी कुछ लोग अनौपचारिक भेंट हेतु महोदय से मिलने आये। संयोग से मैं भी वहीं बैठा कम्प्यूटर पर कुछ कार्य कर रहा था। मैं अपने कार्य के साथ-साथ उनकी बातों पर ध्यान दे रहा था। आगंतुक महोदय ने हिंदी के प्रोफेसर के रूप में अपना परिचय दिया। साथ ही, अन्य आये लोंगो ने सेवानिवृत्त कैप्टन साहब के रूप में अपना परिचय दिया।
अन्य बहुत सी बातें हुई, जब जल-पान के बाद चलने का समय हुआ। तो महोदय भी सम्मान स्वरूप बाहर तक छोड़ने आये। उनके पीछे-पीछे मैं भी निकल आया और महोदय से निगाहें बचाते हुए, आगंतुक अतिथि प्रोफेसर साहब से यह कहते हुए कि ' मुझे भी हिंदी में मुझे भी बहुत रुचि है 'उनका सम्पर्क सूत्र मांग लिया। उन्होंने चलते-चलते अपना विजिटिंग कार्ड मेरे हाथ में थमा दिया। बात आयी-गयी हो गयी।
सन 2016 में उपनिरीक्षक पद पर सीधी भर्ती हेतु कुछ रिक्तियां आयी थी जिसकी हिंदी विषय की तैयारी हेतु मैं आदरणीया श्रीमती सुनयना रस्तोगी जी के संस्थान में पहुँचा। सुश्री सुनयना जी ने हिंदी में मेरी अधिक रुचि को देखते हुए मुझसे पूछा कि आप हिंदी के विद्यार्थी हैं? मैंने ' नहीं ' में उत्तर दिया और बताया कि ' मैं राजनीति शास्त्र में स्नाकोत्तर हूँ।' तब सुनयना जी ने मुझे सुझाव दिया कि स्नाकोत्तर हिंदी विषय के साथ क्यों नहीं कर लेते? साथ ही, बताया कि यदि तुम्हारी रुचि इतनी ही अधिक है तो नेट और पीएचडी भी करो! मैने उनके सुझाव को स्वीकार किया और उनके सामान्य निर्देशन में प्रथम श्रेणी में हिंदी विषय के साथ स्नाकोत्तर किया।
उसी क्रम को जारी रखते हुए वर्ष-2018 में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा(नेट) भी उत्तीर्ण कर लिया। पुनः एक समस्या उत्पन्न हुई कि विद्या वाचस्पति की उपाधि के लिए कोई मार्गदर्शक नहीं था। ध्यातव्य है मैने बहुत बार उस विजिटिंग कार्ड को ढूढ़ने का प्रयास किया, जो मैने कार्यालय में आगन्तुक महोदय से चलते-चलते प्राप्त किया। सभी प्रयास असफल रहे। एक दिन बैंक के कुछ आवश्यक कागज निकालने हेतु महत्वपूर्ण पत्रावली वाला थैला निकाला। बैंक के कागज ढूंढ़ते-ढूंढते अचानक मेरी दृष्टि उस विजिटिंग कार्ड पर पड़ी, तुरंत मैने उसे निकाला और उस पर अंकित मोबाइल नंबर पर सम्पर्क किया। मैंने अपना परिचय देते हुए बताया की आप हमारे महोदय से मिलने कार्यालय आये थे। वहीं आपने चलते-चलते विजिटिंग कार्ड दिया था। उन्होंने अपना परिचय देते हुए बताया कि मैं डॉ महेश दिवाकर बोल रहा हूँ, मिलन विहार में मेरा निवास स्थान है आप आ जाइये।' मैं बिना देरी किये उनके निवास पर पहुँचा और अभिवादन के उपरांत बताया कि मैंने आप की प्रेरणा से एम0ए0 हिंदी के साथ नेट की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली है। यह सुनकर उन्हें बहुत पसन्नता हुई और अपने शिष्य के रूप में मुझे स्वीकार किया। साथ ही चलते समय भेंट स्वरूप स्वरचित यात्रावृत्तांत सहित कई पुस्तकें भेंट की।
तभी से आज तक मेरा मार्गदर्शन कर रहे हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि कैसे छोटे से विजिटिंग कार्ड ने एक पुलिसकर्मी को हिंदी साहित्य का विद्यार्थी बना दिया। यह जीवन भी भांति - भांति के खेल खिलाता रहता है! किस समय, कौन सी घटना आपके जीवन को बदल दे, कुछ नहीं कहा जा सकता। और आपका भावी जीवन ही बदल जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता! वस्तुत: एक विजिटिंग कार्ड ने मेरा जीवन ही बदल दिया है!
-दुष्यंत कुमार
पुलिस लाईन, मुरादाबाद।
मो0-9758000057
बहुत खूब, सराहनीय
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