नीड़ के लिए (कविता)

 कविता- नीड़ के लिए

हर शख्स बेचैन था नीड़ के लिए।

भीड़ ही भाग रही थी भीड़ के लिए।। 


तूफानों से सामना तो हर रोज होता था।

हर रोज खोकर ही कुछ रोज पाता था।।

क्या कमाया, क्या गंवाया समझ नहीं आता था।

 हां! सोने से पहले पेट तो जरूर भर जाता था।।

 

 जीवन में समय की कमी ही कमी थी।

 मां से भी बात होती कभी ही कभी थी।। 

 समय की कमी से अब घर टूटने लगे थे। 

 पति से पत्नी, पत्नियों से पति छूटने लगे थे।।

 

        आशंका की आहट थी और सन्नाटा छा गया।

        कुछ समझने से पहले ही कोरोना आ गया।।

        आपदा ऐसी कि अब लॉक डाउन तो जरूरी था।

        जीने के लिए घरों में अब बंद रहना मजबूरी था।।

        

देखते ही देखते जीने की फिजाएं बदल गयीं।

नदियों का पानी, शहर की हवाएं बदल गयीं।।

पशु-पक्षियों के रहने की अब अदाएं बदल गयीं।

बहुसंख्यक शहरों की अब संख्याएं बदल गयीं।।


         जो कभी इस शहर को अपने पसीने से सींचते थे।

         आज पेट उनका भरने में शहर लाचार दीखते थे।।

         सब्र का जो बांध था, अब वह टूटने लगा था।

         आगे आशा का गांव, शहर पीछे छूटने लगा था।।

         

  भविष्य की आशाओं को कोख में लिए।

 कोई मां अपने नवजात को गोद में लिए।।

 उनके हौसलों में आज धूप ही छांव थी।

 दर्प-दुर्गम सड़क, आज आंगन सी नाप दी।।

 

         हर शख्स बेचैन है नीड़ के लिए।

         भीड़ ही भाग रही है भीड़ के लिए।।

         

      @पूर्णतः स्वरचित

          -दुष्यंत 'बाबा' 

         पुलिस लाईन, मुरादाबाद।

         मो0-9758000057

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

नवजात बहू (लघुकथा)

आओ खुलकर जियें (कविता)

आह! (कविता)