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बच्चों की अभिलाषा (बाल कविता)

विनती हमारी यही है भगवान घर आ जायें दो-चार मेहमान जब-जब घर आते है अतिथि खीर-पूड़ियाँ खूब ही दिखती कौन-कौन से पकते पकवान घर आ जायें दो-चार मेहमान धमा-चौकड़ी खूब हम मचाते मम्मी-पापा  हमें डांट न पाते क्षण भर हम करते न विश्राम घर आ जायें दो-चार मेहमान पुराने मित्रों से  कर लेते कट्टी स्कूल खुलें पर  अपनी  छुट्टी सबसे बन जाते हम अनजान घर आ जायें दो-चार मेहमान अतिथि से हमें विदाई मिलती पूछो न कितनी कुटाई मिलती घर से जब-जब जाते मेहमान घर आ जायें दो-चार मेहमान विनती हमारी यही है भगवान घर आ जायें दो-चार मेहमान लेखक-दुष्यंत 'बाबा' पुलिस लाईन, मुरादाबाद

प्रेम की साधना (कहानी)

    राजन का बचपन पी0ए0सी0 के सरकारी क्वाटरों में बीता था चूँकि राजन के पिता इसी विभाग में हवलदार थे। राजन अब धीरे-धीरे समय किशोरावस्था में प्रवेश कर रहा था। राजन के सामने वाले क्वार्टर में तीसरी मंजिल पर सुधा नाम की एक सुंदर कन्या रहती थी। उसके पिता भी इसी विभाग में सिपाही थे। राजन और सुधा, दोनों के पिता एक ही विभाग में थे इसलिए ड्यूटियां भी अक्सर साथ ही बाहर जाया करती थीं। इसलिए दोनों आपस में बहुत अच्छे मित्र भी थे।         सुधा और राजन दोनों ही पढ़ने में बहुत तेज थे किंतु दोनों का ही अंतर्मुखी स्वभाव था। घरेलू काम-काज में भी दोनों ही अपने-अपने परिवार का हाथ बटाते थे। उनको देखकर आस-पड़ोसी भी सोचते थे कि काश इन दोनों की जोड़ी होती तो कितना अच्छा होता। परंतु राजन और सुधा के बीच कभी कोई ऐसी बात न सुनी थी। दोनों आपस में बात किये बिना भी एक-दूसरे का बहुत सम्मान करते थे। इसी बीच ड्यूटी के दौरान एक मुठभेड़ में राजन के पिता शहीद हो गये थे। कुछ समय बाद सरकार द्वारा पिता के स्थान पर राजन को उपनिरीक्षक की नौकरी हेतु संस्तुति की गई। राजन को 07 दिवस के बाद ...

आधी आबादी पूर्ण बंदिशें (स्त्री विमर्श कविता)

क्या रखाते है? हम शादी की उम्र तक और लगाते है उनकी आजादी में बंदिशें क्यों बिठाते है? हम बेटियों पर ही पहरे और लाते है? दामाद को सजा के सेहरे वर्जिनिटी हाँ! हाँ! ये वर्जिनिटी के लिए ये किसके लिए? हाँ! हाँ! उसी के लिए जिसके पाँव छूकर हवाले कर देंगे बेटी दान दहेज देकर एक असहाय की तरह जो फिर प्रताणित करेगा मारेगा तोड़ेगा तू-तड़ाक कर बदतमीजी से भी बोलेगा स्वयं! फिर से लगाएगा एक और पहरा उसकी उन्मुक्त स्वछंदता, स्वतंत्रता पर आसमान में उड़ने से रोक नही सकते थे वस्तुतः पर ही कतर दिए उड़ान से पहले क्योंकि बेटी! इच्छाओं पर हक नही तेरा इसलिए सपने ही मार दिए आने से पहले जालिम इस जमाने अलग-अलग चेहरे बेटों को टोका नही पर बेटियों पर पहरे यहाँ! बलात्कार की जिम्मेदार भी बेटियां क्यों घर से निकली क्यो पहने ऐसे कपड़े पहरों की बेड़ियों से उन्मुक्त न कर पाई चाहे ससुराल में सास हो या घर में माई आज तो स्वयं पर भी सन्देह होता है कि बेटियों के मां-बाप है हम या फिर कसाई @पूर्णतः स्वरचित -दुष्यन्त 'बाबा' की कलम से साभार दिनांक- 23-01-2021

जीवों पर दया करो (बाल कविता)

  आओ बच्चों! तुम्हें सुनाऊँ कहानी काली कुतिया की गांव में रहती काली कुतिया जगती थी वह सारी रतियाँ भौंक-भौंक सबको जगाती और चोरों को रोज भगाती खाना खाने को घर आती बचा-खुचा सारा खा जाती प्यार करो तो पूँछ हिलाती देखो कितना मन बहलाती पांच पिल्ले हर साल ब्याती सबके सबको दूध पिलाती बड़े छूऐं तो आंख दिखाती छोटे बच्चों का मन हर्षाती गाँव छोड़ कभी दूर न जाती सबके घर अधिकार जताती माता जी व्याकुल हो जातीं किसी रोज कुतिया न आती कहीं-कहीं डंडे भी खा आती अपना दुःख कह भी न पाती यदि किसी से कष्ट पा जाती आंखों से आंसू खूब  बहाती बच्चों! आज तुम एक प्रण करो अब प्रकृति का अदा ऋण करो अत्यधिक यदि न कर सकते तो कम से कम जीवों से प्यार करो बच्चों! तुमको कैसी लगी आज, यह कहानी काली कुतिया की। -दुष्यंत 'बाबा' पुलिस लाईन, मुरादाबाद। दिनांक- 12-01-2021

मुद्दतें (गज़ल)

 मुद्दतों के बाद तन्हा उस गली से गुजरा था आज बेपनाह मुझे उसकी याद आ रही थी दरवाजे के पर्दे हिल कर सलाम कर रहे थे मुझे आज यही सलामी भी दुख दे रही थी वो दीवारों की दरकतें चुगलियां कर रही थी छुपा नही कोई किस्सा हमसे ये कह रही थी हम महबूबा नही है तुम्हारी जो झूठ बोल दें देकर दगा तुझे किसी और के साथ रही थी मैं तो आज भी उन्ही लम्हों को जी रहा था सिसकियां उठ रही थी जिन्हें मैं पी रहा था हवेली के छज्जे को मुड़-मुड़ कर देखता था जहाँ पर खड़े होकर वह मुझे देखती थी। अब मुझे उसके आँसू तिल-तिल तोड़ते थे वो घड़ियाली आंसू इस क़दर वहा रही थी मुझे तुम्हारे बिन पल-भर जीना गवारा नही वो जुदाई में सीने से लिपट यह कह रही थी -दुष्यंत 'बाबा' की कलम से साभार

अपराध बोध (एक लघुकथा)

       "हैलो इधर सुनो" कहते हुए चंदो ने राजन को इशारा किया। राजन ठिठका और चंदो के पीछे-पीछे चल दिया वह राजन को कॉलेज के उस एकांत कमरे में ले गयी जहाँ पहले से चंदो की अन्य पांच सहेलियां बैठी थीं। राजन वहाँ पहुँच अवाक सा खड़ा हो गया, क्योंकि ये वही सारी लड़कियां थी, जो राजन के अन्य छः मित्रों सहित इंटरमीडिएट दोनों वर्षों इंग्लिश की कोचिंग में साथ पढ़ी थीं।      "राजन तुम अनु की जानते हो" चंदो ने पूछा।   "हां.. हां.. हाँ क्या हुआ उसको" राजन ने कहा।   "तुम्हारी और तुम्हारे कमीने दोस्तों की बजह से आज उसकी पढ़ाई छूट गयी और आत्मग्लानि से एकबार आत्महत्या करने का प्रयास भी किया है। तुम तो संस्कारी परिवार से हो तुम्हारी बहन हमारी सीनियर रहीं है। तुम ऐसे लोगों का साथ छोड़ क्यों नहीं देते।" चंदो ने राजन से कहा।       राजन ने अनभिज्ञता जताते हुए कहा "मैं और मेरे दोस्तों की बजह से???"       तब चंदो ने बताया कि "कुछ दिन पूर्व हमारे गांव में शिवलिंग उत्तपन्न हुए थे तब तुम अपने दोस्तों के साथ उसे देखने आ...

एक और द्रोपदी (एक लघुकथा)

        आज खुशी-खुशी दो दिन के अवकाश पर गांव के लिए निकला था कि गांव के बाहर मुख्य मार्ग पर गाड़ी रोकी सोचा, कि घर जा रहा हूं तो खाली हाथ नहीं जाना चाहिए। सो एक ठेले पर पहुंचा जहां एक युवती बहुत ही गंदे कपड़ों में फल बेच रही थी। मैं जैसे ही फल लेने उसके पास पहुंचा कि वह मुझे एक टक देखती रही, मानो जैसे वह मुझे पहले से जानती हो। आंखों में आंसू लिए वह ठेला छोड़कर चली गयी। पड़ोस के नल पर  मुँह धुलकर वह एक नई नई ऊर्जा के साथ वापस आ गई।      मैने उससे पूछा कि "क्या तुम मुझे जानती हो ?"          "हाँ! मैं तुम्हें जानती हूँ तुम्हारा नाम राजन है" उसने उत्तर दिया ।          मैंने उससे पुनः पूछा कि "तुम्हारा क्या नाम है"          "मेरा नाम आशा है तुम्हारे मित्र डैनी. नी. नी...।" कहते हुए वह तेजी से रो पड़ी। इतना सुनते ही मेरा माथा कौंध गया सारा वृतांत याद आ गया।             बा...

साहब का कुत्ता (एक हास्य-व्यंग्य कहानी)

      बात उन दिनों की है जब भोला राम आरक्षी के रूप में बडे साहब के कार्यालय में तैनात थे पुराने साहब के ट्रान्सफर के बाद नये साहब की तैनाती हुई। नये साहब छोटे से कद के थे परन्तु बड़े चट-पटे थे। साहब ने अपने थोड़े से सामान के साथ कार्यालय में आगमन किया चूंकि कार्यालय तथा आवास एक ही परिसर में था इसलिए साहब के आते समस्त कार्यालय स्टाफ शिष्टाचार भेंट के लिए इकट्ठा हो गया सभी के परिचय के साथ भोला राम ने भी साहब को सलाम ठोंक दिया। साहब कभी ए.एस.पी. से सीधे आई.जी. बने थे इसलिए साहब में पूरी हनक थी बात-बात पर अपने कन्धे पर लगे स्टार और अन्य साज सज्जा की ओर देखते हुए स्टाफ को कहते थे कि "जमीनी अफसर रहा हूँ कभी कोई गड़बड़ी की तो छोडूंगा नही" समस्त स्टॉफ एक शब्द में "जी सर" कहकर साहब की तारीफ में कसीदे लगाने लग जाता।           कुछ ही समय बीता था कि साहब की मैडम का मय सामान के बंगले पर आगमन हुआ। सभी कर्मचारियों ने बडे़ उत्साह के साथ सामान उतरवा दिया। कर्मचारियों का धन्यवाद करने साहब हाथ में जंजीर थामे एक कुत्ता साथ में लिए आ गये। साहब सभी को 'धन्यवाद' कहने वाले ह...