गीत
साँसो का स्पंदन कहता है उखड़ा-उखड़ा मन रहता है और आँखों से बहता पानी घर आ जाओ अब महारानी.... कुमल्ही तुलसी पुकार रही है आकर गाय द्वार खड़ी है मांग रही है भोजन-पानी घर आ जाओ अब महारानी.... पुष्प सा कोमल बिस्तर चुभता काँटे लगती सेज सुहानी प्राण तुम्ही हो तुम जिंदगानी घर आ जाओ अब महारानी.... टँगी दीवार जो युगल छवि हैं आलंबन करें उद्दीप्त तुम्हारा याद दिला सब बात पुरानी घर आ जाओ अब महारानी.... बिन बच्चों के गलियाँ सूनी लगती हैं सब कितनी खूनी करता नही अब कोई शैतानी घर आ जाओ अब महारानी.... गुजरा पल था अच्छा कल था पेड़ से उतरीं चिड़ियाँ कहती आकर डालो, हमें दाना-पानी घर आ जाओ अब महारानी.... लगता जीवन अब स्वेत पत्र भटक रहा ...