संदेश

गीत

साँसो  का  स्पंदन  कहता है उखड़ा-उखड़ा मन  रहता  है और आँखों  से  बहता पानी घर आ  जाओ अब महारानी.... कुमल्ही तुलसी पुकार रही है आकर  गाय  द्वार   खड़ी  है मांग  रही   है   भोजन-पानी घर आ  जाओ अब महारानी.... पुष्प सा कोमल बिस्तर चुभता काँटे  लगती    सेज     सुहानी प्राण तुम्ही  हो  तुम  जिंदगानी घर आ  जाओ अब महारानी.... टँगी  दीवार  जो युगल छवि हैं आलंबन  करें  उद्दीप्त  तुम्हारा याद  दिला   सब  बात  पुरानी घर आ  जाओ अब महारानी.... बिन बच्चों  के  गलियाँ   सूनी लगती  हैं  सब  कितनी  खूनी करता नही अब  कोई  शैतानी घर आ  जाओ अब महारानी.... गुजरा पल था अच्छा कल था पेड़ से  उतरीं  चिड़ियाँ  कहती आकर  डालो, हमें दाना-पानी घर आ  जाओ अब महारानी.... लगता  जीवन  अब  स्वेत पत्र भटक   रहा    ...

पितृ दिवस

 राह सत्य  की बड़ी कठिन है कोशिश करके चलते रहना  आगे-आगे    पिता    चलेंगे  तुम  पद  चिन्हों  पर चलना यदि   तपोगे  स्वर्ण  बनोगे द्रवित  होकर  ढलते  रहना सहनशक्ति  से  बनोगे अर्चा नही सड़क पर डलते रहना ©दुष्यन्त 'बाबा'

नवजात बहू (लघुकथा)

पिता की मृत्यु के बाद मोहन ने ही अपनी छोटी बहन छवि को पढ़ाया-लिखाया और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान दहेज देकर एक शहरी परिवार में उसकी शादी कर दी। किन्तु उसकी सास आये दिन उसका ताना दे-दे देकर मानसिक उत्पीड़न करती रहती थी। समय  के साथ ही मां के कहने पर मोहन ने भी शादी कर अपना घर बसा लिया और उसके घर प्यारी सी बेटी ने जन्म लिया। उधर छवि की ननद दीपा को भी पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। इधर छवि की सास का उत्पीड़न उसके प्रति बढ़ता ही जा रहा था एक दिन मोहन अपनी एक वर्षीय पुत्री को लेकर दीपा के घर पहुंच गया और यह कहते हुए अपनी पुत्री दीपा को थमा दी कि इसे आप खुद ही रखो और सिखाओ-पढ़ाओ अन्यथा भविष्य में कभी तुम्हारे बेटे से इसका रिश्ता हुआ तो तुम भी यही कहोगी जो तुम्हारी माँ मेरी बहन छवि से कहती है कि "मायके वालों के सिखाये में चल रही है।" दीपा की ससुराल के सभी सदस्य निरुत्तर मौन खड़े मोहन का मुंह देख रहे थे। -दुष्यन्त 'बाबा' पुलिस लाईन, मुरादाबाद।

पुस्तक समीक्षा : सपनों का शहर

 पटल पर उपस्थित सभी गुणीजनों को सादर प्रणाम निवेदित करते हुए आज मैं आपके समक्ष आदरणीय दादा अशोक विश्नोई जी के लघुकहानी संग्रह "सपनों का शहर" की परिचयात्मक, विश्लेषणात्मक और मूल्यांकन परक  लिखित समीक्षा प्रस्तुत कर रहा हूँ 🙏 ======================================= *पुस्तक समीक्षा*  *पुस्तक का नाम* : सपनों का शहर *(कहानीकार)*   : श्री अशोक विश्नोई *प्रकाशक*         : विश्व पुस्तक प्रकाशन                      304-ए, बी.जी.-6, पश्चिम विहार                            नई दिल्ली-63, भारत।  ISBN              :97-81-89092-38-2                            *प्रकाशन वर्ष*  : 2022    *मूल्य*          : 250 रुपए,     *कुल पृष्ठ*     :  103 --...

गनर यज्ञ (हास्य-व्यंग)

      बड़े-बड़े शहर के बड़े परिवारों को घर के लिए काम वाली बाई खोजना जितना दुष्कर कार्य है उतना ही कठिन कार्य है उसे लंबे समय तक रोकना, मजाल क्या है कि कभी उसकी पगार में देरी कर दें या किसी त्योहार पर बोनस न भी दें। आज-कल बाई पर निर्भरता इस कदर बढ़ चुकी है कि एक दिन न आये तो खाना-खाने के लिये भी घर से बाहर जाना पड़े। इसलिए उसकी प्रत्येक समस्या का ध्यान घर के सदस्यों की आवश्यक्ताओं से अधिक रखा जाता है। यह तो हुई स्त्री वर्ग की एक समस्या।        अब ऐसी ही एक समस्या इस समाज के पुरुष वर्ग की भी है। आज पैसा है, बंगला है, गाड़ियां हैं, बड़े अधिकारियों और नेताओं में उठा-बैठ है पर कहीं न कही शेडो/गनर न होने की टीस दिखाई देती है। टीस हो भी क्यों नही! कितनी महंगी गाड़ी हो या ऊंची-ऊंची पार्टियों में शिरकत हो बिना गनर के बात जमती नही, लोग उसे ही अधिक तबज्जो देते है जिसके साथ पुलिस विभाग से मिला गनर चल रहा हो। इसलिए गनर प्राप्त करने का एक चलन सा चल गया है। कुछ महत्वपूर्ण व्यक्तियों को उनके जीवन भय या प्रोटोकॉल के लिए आवश्यक सुरक्षा के रूप गनर/बल प्रदान किया जाता है परन्तु ...

दादी की कहानी-बाल कविता

 दादी! सुनाओ ऐसी कहानी जिसमें हो परियों की  रानी या हो  पुरानी सदियों वाली बूढ़ी  परी या नदियों  वाली तब दादी की छनकी पायल और कहा  परी  थी  घायल सुंदर  परियां  उड़कर जाती कह जाती थी उससे पागल किंतु समय  सभी का आया एक का होकर रुक  न पाया एक  दैत्य  साधु  बन  आया सबसे अपना रहस्य छिपाया सम्मोहन का जाल बिछाकर सुंदर  परियों को  ललचाकर समझकर परियां  नई-नवेली करता था मनभर  अठखेली पहचान न  पाते उसका  वेश परियां ले  जाता  अपने  देश पर बूढ़ी परी ये जान गयी थी उसके छल  पहचान गयी थी छड़ी जादू की वह  ले आयी जो  थी उसने नानी से  पायी छड़ी घुमाकर जो मारा मंतर भस्म हो गया  दानव तत्क्षण ये नन्ही परियां सोच रहीं  थीं खुद को मन में कोस रही थी आशीष  सदा बड़ों से पाते हैं धोखे छल से बच ही  जाते हैं *-©दुष्यन्त 'बाबा'* पुलिस लाईन, मुरादाबाद।

करिया रंग (पुलिस कविता)

 करिया रंग पर प्रचलित हास्य-व्यंग से प्रेरित होकर एक नवीनतम प्रस्तुति...😂😂😂😂 सिपाही पहुंचा ससुराल में, अपने साथी संग करिया रंग को देखकर, साली  हो  गयी दंग बात करने से  बच  रही, बदल  रही  थी ढंग दीदी हमारी गोरी चिठ्ठी, तुम हो काले भुजंग दिल टूटा दीवान का,  थाना पहुँचा   तत्काल एसओ साहब भी आ गए, बढ़ता देख बबाल गुस्सा मत  करो प्यारे, हो जाओ  कुछ  शांत ठंडा पानी पीकर तुम, सब बतलाओ वृतान्त लगा बताने दीवान भी, उनपर कर  विश्वास पहुंचा था ससुराल में, मन में थी कुछ आस पर मेरी ससुराल  में, मुझ पर कसे गए तंज साली मुझसे कह गयी, तुम हो काले भुजंग गर्मी ऐसी भयंकर ,कि सिन्धु दरिया हो गया दिनभर ड्यूटी करके, मैं भी करिया हो गया मुंशी तुरंत बोल पड़ा, हो जायेगी हवा टाइट  दिन की ड्यूटी के बाद, यदि लगा दी  नाईट कारखास से न रहा गया, वो भी बना महान राज्य प्रहरी की  नौकरी, होती नही आसान  हेड मोहर्रिर को  समझो, हर थाने की  दाई समझा रहा  दिवान को, जैसे हो  बूढ़ी ताई करिया रंग को  देखकर, मत हो ...

मेघों का परिवार (कविता)

मेघों का भी  मेघालय से कितना अनुपम प्यार है होते हैं घरवार सभी के इनका भी एक परिवार है कितनी बेबस थी, बूंद ताप सूर्य का सह न पायी तुम क्या जानो! ये बिछड़ सिन्धु से कितना रोयी दिये विदाई  सागर रोया  उसका यह परिवार था हृदय पाषाण समझ सके न ऐसा गहरा प्यार था था विक्षिप्त मन सो  नभ में मेघों से मिलन हुआ मेघों ने भी बढ़कर उसको अपने भर अंक लिया बनी निराशा आशा फिर एक नया परिवार मिला जितनी बिछड़ी बूंदे थी उन सबसे भी प्यार मिला दिल में भर उन्माद उड़ती फिरतीं ये गगन-गगन उन्मादों से होता था मन कितना मद मस्त मगन मगर हिमालय के  सौंदर्य ने ऐसा जाल बिछाया हुईं आकर्षित  बूंदे उस पर अम्बुज रोक न पाया महत्वकांक्षी मन हो जाये तब कोई रोक न पाता जैसे घर-घर घूमी त्रिया का चरित्र बच नही पाता तोड़ा उसने मेघ से नाता और बूंद धरा पर आयी मां सी ममता मिली उसे जब आकर नदी समाई बहती सरिता देखी तो हृदय सागर का भी फूटा पुनर्मिलन सुख देता है यदि बेबस हो कोई छूटा ©पूर्णतः मौलिक -दुष्यन्त 'बाबा' पुलिस लाईन, मुरादाबाद। मो 0-9758000057

विवाह मंगल गीत-बन्ना

मेरो बन्ना बड़ो अनाड़ी गुजरिया छुप-छुप देखे रे!!! जेठ महीना गर्मी आवें  झलें बीझना जल भर लावे चदरिया हल्की ताने रे!! मेरो बन्ना बड़ो अनाड़ी गुजरिया छुप-छुप देखे रे!!! सावन-भादों झर लग जावें झींगा बोलें दादुर गावें पंखुरियाँ उड़-उड़ आवें रे!! मेरो बन्ना बड़ो अनाड़ी गुजरिया छुप-छुप देखे रे!!! पूस-माघ जब सर्दी आवें चल पुरवैया हाड़ कँपावे रजइया छोटी लावे रे!!! मेरो बन्ना बड़ो अनाड़ी गुजरिया छुप-छुप देखे रे!!! बसन्त आय फागुन जो आवे मादक-मादक फ़ाग सुनावे अरे-रे वो तो लाड़-लड़ावे रे!! मेरो बन्ना बड़ो अनाड़ी गुजरिया छुप-छुप देखे रे!!! -दुष्यन्त 'बाबा' पुलिस लाईन, मुरादाबाद *भावार्थ*- इस गीत को समझने से पहले बन्ना शब्द का अर्थ समझना आवश्यक है विवाह के समय किसी स्त्री/पुरूष के  हाथ या पैर में कंकन (नवग्रह की प्रतीक पीली सरसों, कोड़ी, लोहा, सुपारी आदि का नौ वस्तुओं समुच्चय) बांध दिया जाता है उसे बांधे जाने के बाद व खोले जाने से पूर्व की स्थिति तक व्यक्ति को बन्ना कहते है। ऐसा ही कोई बन्ना अपनी नवोड़ा के साथ है और जेठ का महीना आ चुका है वह अपनी सजनी के लिए ठंडा पानी भी लाकर देता है बीझना (हाथ का पंखा) से ह...

विवाह मंगल गीत-बन्नो

बन्नी तोय ऐसौ मिले भरतार सजल दिन नैनन राखे रे!!! भोर भये जब दिन चढ़ आवे तौते पहले वो उठ जावे हाथ चाय लेई तोय जगावे अंक भरे फिर तोय पिलावे अरे! अखियन बरसे प्यार सजल दिन नैनन राखे रे!!! पनिया भरन तू पनघट जावै ननद बेचारी राह निहारे सखी-सहेली के सम जानै दो-दो गगरी खुद भर लावै अरे! तोय छुए न जल धार सजल दिन नैनन राखे रे!!! चौका चूल्हे जब हाथ लगावै माई बने तेरी सासु आवै  वोई पवे और तोय खवावै चूल्हे आंच से तोय बचावै अरे! तेरी करे बीझना बियार सजल दिन नैनन राखे रे!!! गोबर-कूरे जब जाना चाहे धरें परात ससुर जी आवै घूघंट काढ़े न लाज लजावै बेटी के सम मान वो वारै अरे! गइयन की काढ़े धार सजल दिन नैनन राखे रे!!! बन्नी तोय ऐसौ मिले भरतार सजल दिन नैनन राखे रे!!!