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गीत

साँसो  का  स्पंदन  कहता है उखड़ा-उखड़ा मन  रहता  है और आँखों  से  बहता पानी घर आ  जाओ अब महारानी.... कुमल्ही तुलसी पुकार रही है आकर  गाय  द्वार   खड़ी  है मांग  रही   है   भोजन-पानी घर आ  जाओ अब महारानी.... पुष्प सा कोमल बिस्तर चुभता काँटे  लगती    सेज     सुहानी प्राण तुम्ही  हो  तुम  जिंदगानी घर आ  जाओ अब महारानी.... टँगी  दीवार  जो युगल छवि हैं आलंबन  करें  उद्दीप्त  तुम्हारा याद  दिला   सब  बात  पुरानी घर आ  जाओ अब महारानी.... बिन बच्चों  के  गलियाँ   सूनी लगती  हैं  सब  कितनी  खूनी करता नही अब  कोई  शैतानी घर आ  जाओ अब महारानी.... गुजरा पल था अच्छा कल था पेड़ से  उतरीं  चिड़ियाँ  कहती आकर  डालो, हमें दाना-पानी घर आ  जाओ अब महारानी.... लगता  जीवन  अब  स्वेत पत्र भटक   रहा    ...

पितृ दिवस

 राह सत्य  की बड़ी कठिन है कोशिश करके चलते रहना  आगे-आगे    पिता    चलेंगे  तुम  पद  चिन्हों  पर चलना यदि   तपोगे  स्वर्ण  बनोगे द्रवित  होकर  ढलते  रहना सहनशक्ति  से  बनोगे अर्चा नही सड़क पर डलते रहना ©दुष्यन्त 'बाबा'