चिरैया (निबंध)
मैं जब कभी ये सोचता हूँ कि मैं रिश्वत नही लेता। फिर विचार करता हूँ कि क्या मैं ईमानदार हूँ? क्या रिश्वत न लेना ही ईमानदारी है तो मैं कहुँगा कि कदापि नही! हमें स्वंय को ईमानदार घोषित करने से पूर्व ईमानदारी के लिए जरूरी तत्वों का अध्यन करना नितान्त आवश्यक है। ईमानदार बनने के लिए आचरण की ईमानदारी, कर्तव्य के प्रति ईमानदारी के साथ दूसरों की स्वतंत्रता व स्वायत्ता को बनाये रखने की ईमानदारी पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
यदि आज मैं 6, 7 या 8 घण्टे काम करके झउआ भर वेतन लेता हूँ। सभी राजकीय सुविधाओं तथा भत्तों का लाभ लेता हूँ, फिर भी मैं ईमानदार हूँ। तब मुझे उस मेहनती किसान की याद आती है जिस पृष्ठभूमि से मैं स्वयं निकलकर आया हूँ। यदि मैं ईमानदार हूँ तो फिर वह किसान क्या है, जो दिन-रात मेहनत कर अपनी फसल को तैयार करता है। जिसमें उसकी सभी क्रियाएं बुवाई, सिंचाई, निराई, गुढ़ाई, खाद, पानी इत्यादि क्रियाओं के साथ अपने बीस नाखूनों की कमाई सम्मिलित हैं तब फसल पककर तैयार होती है।
तैयार फसल को जब वह काटता है। तब मुझे इस व्यंग के शीर्षक “चिरैया“ की याद आती है। क्योंकि किसान को आज भी याद है कि उसके इस पंच तत्व के शरीर के जन्म के साथ पांच ऋण भी लेकर पैदा हुआ है इसी एक ऋण (भूत ऋण) से उद्धार होने के लिए फसल की कटाई के दौरान खेत के एक कोने पर फसल का एक भाग 'चिरैया' के रूप में खड़ा छोड़ देता है ताकि पात्र जीव उसे ग्रहण कर अपना जीविकोपार्जन कर सके।
तैयार फसल गहाई के बाद रास होकर घर आती है तदोपरान्त भी उस फसल पर अपना एकाधिकार समझना उसे बेमानी लगता है क्योंकि इससे कई अंश अभी विभिन्न व्यक्तियों तथा संस्थाओं को देना वाकी है। जिनमें से मुझे कुछ याद भी है जैसे- मन्दिर/मस्जिद, पुरोहित, पंचायत, नाई, धोबी, बढ़ई, लुहार, जमादार व कर्मकार इत्यादि। बात अभी यही खत्म नही होती है दिन में जितनी बार भोजन बनेगा तो पहली रोटी गाय के लिए तथा अन्तिम रोटी कुत्ते के लिए अवश्य बनायी जाती है।
इन सभी उत्सर्गो पर मेरा ध्यान जाता है तो मुझे अपनी ईमानदारी धत्ता लगती है कम से कम 25-30 हजार वेतन पाना तथा समस्त वेतन को निजि हित में खर्च कर लेना, चाहे वह बच्चों की शिक्षा हो, मकान-दुकान बनाना हो या अपने शौक की पूर्ती पर। जब कभी समाज में बैठता हूँ तो बडे़ गर्व से सीना तानकर कहता हूँ कि मैं ईमानदार हूँ।
यदि मैं इतनी कम मेहनत के बाद भी इतना वेतन पाकर और समस्त वेतन स्वयं पर खर्च करता हूँ न तो किसी प्रकार का दान करता हूँ और न ही किसी पात्र व्यक्ति की मदद करता हूँ फिर भी मैं ईमानदार हूँ तो इस किसान को किन शब्दों से अलंकृत करूँ जो ईमानदारी पराकाष्ठा को पार कर एक नई परिभाषा तैयार करता है क्योंकि यह ईमानदारी शब्द उसके लिए पर्याप्त नही है। यदि मैं स्वयं को 24 कैरेट सोने की तरह शुद्ध समझता हूँ तो मैं उस 24 कैरेट सोने को तपती भट्टी में डालकर और अधिक परिष्कृत करूँगा तथा प्राप्त धातु के नाम की संज्ञा उस किसान को दूँगा साथ ही उसकी ईमानदारी को परिभाषित करने लिए के लिए पूरक किसी नये शब्द की खोज करूँगा।
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लेखक-दुष्यन्त कुमार
एम0ए0 (हिन्दी) नेट,अध्यनरत शोधार्थी
E-mail-yadu.dushyant0@gmail.com
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