व्यथित (विचारों का मानवीकरण)
लेखनी बोली एक दिन होकर बहुत उदास
बलात्कारियों की जकड़ में आती नही सांस
कागज से कब रहा गया वह भी कूदा जाय
मुझको गन्दा कर रहे कोई और नही उपाय
कुत्ता बनकर नौचता मनुज-मनुज को खाय
छोड़ो 'बाबा' मुझको असलहा लेओ उठाय
बुद्धि तैस में आ गयी जागा निज स्वाभिमान
मनुज-मनुज अब रहा नही,बना हुआ हैवान
अबला कहाँ सुरक्षित अब गली-गली शैतान
ऐसे दरिद्र समाज को अब निपटा दो भगवान
हृदय भी रोने लगा कोई शब्द नही अब शेष
मासूम सी वो पीड़िता बनी मिट्टी के अवशेष
राजनीति के कीटों का ये अवसर था विशेष
कभी बेटे को दुत्कार नही बलात्कारी से द्वेष
'बाबा' तब कहने लगे सुनकर करुण चीत्कार!
बलात्कारी को मौत हो, ठरकी का तिरस्कार
दुर्घटना को बचा सकें तो सैनिक सा सत्कार
मन में हो नारी सम्मान, तो हो सकता उद्धार
दुष्यंत 'बाबा'
एम.ए. संस्कृत, हिंदी (नेट)
पुलिस लाईन, मुरादाबाद
सम्पर्क-9758000057
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