बच्चों की अभिलाषा (बाल कविता)


विनती हमारी यही है भगवान

घर आ जायें दो-चार मेहमान


जब-जब घर आते है अतिथि

खीर-पूड़ियाँ खूब ही दिखती

कौन-कौन से पकते पकवान

घर आ जायें दो-चार मेहमान


धमा-चौकड़ी खूब हम मचाते

मम्मी-पापा  हमें डांट न पाते

क्षण भर हम करते न विश्राम

घर आ जायें दो-चार मेहमान


पुराने मित्रों से  कर लेते कट्टी

स्कूल खुलें पर  अपनी  छुट्टी

सबसे बन जाते हम अनजान

घर आ जायें दो-चार मेहमान


अतिथि से हमें विदाई मिलती

पूछो न कितनी कुटाई मिलती

घर से जब-जब जाते मेहमान

घर आ जायें दो-चार मेहमान


विनती हमारी यही है भगवान

घर आ जायें दो-चार मेहमान

लेखक-दुष्यंत 'बाबा'

पुलिस लाईन, मुरादाबाद


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