मुद्दतें (गज़ल)
मुद्दतों के बाद तन्हा उस गली से गुजरा था
आज बेपनाह मुझे उसकी याद आ रही थी
दरवाजे के पर्दे हिल कर सलाम कर रहे थे
मुझे आज यही सलामी भी दुख दे रही थी
वो दीवारों की दरकतें चुगलियां कर रही थी
छुपा नही कोई किस्सा हमसे ये कह रही थी
हम महबूबा नही है तुम्हारी जो झूठ बोल दें
देकर दगा तुझे किसी और के साथ रही थी
मैं तो आज भी उन्ही लम्हों को जी रहा था
सिसकियां उठ रही थी जिन्हें मैं पी रहा था
हवेली के छज्जे को मुड़-मुड़ कर देखता था
जहाँ पर खड़े होकर वह मुझे देखती थी।
अब मुझे उसके आँसू तिल-तिल तोड़ते थे
वो घड़ियाली आंसू इस क़दर वहा रही थी
मुझे तुम्हारे बिन पल-भर जीना गवारा नही
वो जुदाई में सीने से लिपट यह कह रही थी
-दुष्यंत 'बाबा' की कलम से साभार
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