आधी आबादी पूर्ण बंदिशें (स्त्री विमर्श कविता)

क्या रखाते है? हम शादी की उम्र तक

और लगाते है उनकी आजादी में बंदिशें
क्यों बिठाते है? हम बेटियों पर ही पहरे
और लाते है? दामाद को सजा के सेहरे

वर्जिनिटी हाँ! हाँ! ये वर्जिनिटी के लिए
ये किसके लिए? हाँ! हाँ! उसी के लिए
जिसके पाँव छूकर हवाले कर देंगे बेटी
दान दहेज देकर एक असहाय की तरह

जो फिर प्रताणित करेगा मारेगा तोड़ेगा
तू-तड़ाक कर बदतमीजी से भी बोलेगा
स्वयं! फिर से लगाएगा एक और पहरा
उसकी उन्मुक्त स्वछंदता, स्वतंत्रता पर

आसमान में उड़ने से रोक नही सकते थे
वस्तुतः पर ही कतर दिए उड़ान से पहले
क्योंकि बेटी! इच्छाओं पर हक नही तेरा
इसलिए सपने ही मार दिए आने से पहले

जालिम इस जमाने अलग-अलग चेहरे
बेटों को टोका नही पर बेटियों पर पहरे
यहाँ! बलात्कार की जिम्मेदार भी बेटियां
क्यों घर से निकली क्यो पहने ऐसे कपड़े

पहरों की बेड़ियों से उन्मुक्त न कर पाई
चाहे ससुराल में सास हो या घर में माई
आज तो स्वयं पर भी सन्देह होता है कि
बेटियों के मां-बाप है हम या फिर कसाई

@पूर्णतः स्वरचित

-दुष्यन्त 'बाबा'

की कलम से साभार
दिनांक-23-01-2021

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