पुस्तक समीक्षा : सपनों का शहर

 पटल पर उपस्थित सभी गुणीजनों को सादर प्रणाम निवेदित करते हुए आज मैं आपके समक्ष आदरणीय दादा अशोक विश्नोई जी के लघुकहानी संग्रह "सपनों का शहर" की परिचयात्मक, विश्लेषणात्मक और मूल्यांकन परक  लिखित समीक्षा प्रस्तुत कर रहा हूँ 🙏

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*पुस्तक समीक्षा* 

*पुस्तक का नाम* : सपनों का शहर

*(कहानीकार)*   : श्री अशोक विश्नोई

*प्रकाशक*         : विश्व पुस्तक प्रकाशन

                     304-ए, बी.जी.-6, पश्चिम विहार

                           नई दिल्ली-63, भारत।

 ISBN              :97-81-89092-38-2                          

 *प्रकाशन वर्ष*  : 2022

   *मूल्य*          : 250 रुपए, 

   *कुल पृष्ठ*     :  103

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 *समीक्षक*         : दुष्यन्त 'बाबा', पुलिस लाईन

                           मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) 

*सम्पर्क सूत्र-*      : 9758000057

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          आदरणीय दादा अशोक विश्नोई जी की पुस्तक 'सपनों का शहर' 103 पृष्ठों में वर्णित 101 लघुकहानियों  के संग्रह का आगाज *'चेतना को जगाने का प्रयास करती लघुकथाएं'* शीर्षक से डॉ0 मीरा कश्यप, विभागाध्यक्ष हिंदी, केजीके महाविद्यालय, मुरादाबाद द्वारा लिखित सारगर्भित भूमिका के साथ होता है तत्पश्चात *'जीवन के यथार्थ का अन्वेषण करती हैं अशोक विश्नोई की लघुकथाएं'* शीर्षक से डॉ0 मनोज रस्तोगी द्वारा लिखित लघु कथा के मानकों पर रमेश बतरा और विष्णु प्रभाकर के लघुकथा संबंधी विचारों के आधार पर की गई समीक्षा के दर्शन प्राप्त होते है। इसके साथ ही आदरणीय अशोक विश्नोई जी द्वारा 'कुछ शब्द' शीर्षक से पुस्तक लेखन के विचार से लेकर इसके प्रकाशन तक आवश्यक सहयोगी तत्वों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की गई है।      

     *विधा बोध-* 'सपनों का शहर' पुस्तक की समीक्षा प्रारंभ करने से पूर्व यह जानना भी आवश्यक है कि कहानी विधा प्रचलित होने के उपरांत भी लघुकथा लेखन की आवश्यकता क्यों हुई। वर्तमान वैश्वीकरण के दौर में बढ़ती प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए क्रायोजेनिक तकनीक के प्रचलन में तेजी से वृद्धि हुई है ताकि कम समय, स्थान और लागत में अधिक ऊर्जा या परिणाम प्राप्त हो सकें। जिस प्रकार 8 ग्राम यूरेनियम 24 टन कोयले के बराबर ऊर्जा उत्पन्न करता है। उसी प्रकार विश्नोई जी की चंद पंक्तियों में व्यक्त लघुकथाऐं 5-6 पृष्ठों में वर्णित दीर्घ कहानी के सार को स्वयं में समाहित किए हुई हैं। अतः *इन लघुकथाएं को क्रायोजेनिक या संपीडित कथाएं कहना अतिशयोक्ति नही होगा।*

     *शीर्षक-* उक्त पुस्तक में वर्णित लघु कथाओं के शीर्षक इतने उत्कृष्ट कोटि के हैं कि स्वयं ही सम्पूर्ण लघुकथा का सार व्यक्त कर पाने में सक्षम हैं साथ ही एक उत्तम लघुकथा के लिए आवश्यक तत्व जैसे- स्थान, देशकाल एवं वातारण, भाषा, कथानक, पात्र चयन और उद्देश्य भी लघुकथा की दृष्टि से सफल प्रतीत होते हैं   

     *पात्र चयन-* एक लघुकथाकार के लिए लघुकथा में पात्रों का चयन करना भी एक चुनौती पूर्ण कार्य होता है परन्तु इस चुनौती को स्वीकार करते हुए विश्नोई जी ने परिस्थिति, देश काल और वातावरण की दृष्टि से पात्रों का चयन किया है जैसे शहरी  अधिकारी, नेता, साहूकार, भिखारी, ग्रामीण, धनिक, गरीब, दलित आदि अलग-अलग वर्ग के पात्रों का चयन लघुकथा की परिस्थिति और वातावरण को ध्यान में रखकर ही किया है विजयानन्द, अंकुर, टीपू, प्रभाकर, मोहन, बसन्त, पंकज, सुमन, आकाशदीप, कुसुम, रामू, गीता, गोविंदराम, लाजो, हिमांशु आदि सभी पात्र लघुकथा की परिस्थितियों से पूरा सामंजस्य बनाए हुए प्रतीत होते हैं।

     *संवाद योजना-*किसी भी लघुकथा या कहानी में पात्रों के मध्य हुए संवाद उस दृश्य को पाठक के समक्ष चित्रित कर देते है पाठक जिसका साधारणीकरण स्वयं में कर लेता है तथा कथा की घटना से उत्पन्न रस का पान करता है। इस पुस्तक के सभी संवाद बहुत ही जीवंत है परन्तु उनमें से कुछ जैसे- भूखे बच्चों द्वारा कहना कि "हमारा पेट तो कहानियों से भर जाता है..मां!! और बच्चे उठकर सोने चल दिये..।(भूँख), सेठ द्वारा पानी को यह कहते हुए मना कर देना यहाँ कोई इंसान नही है तुझे पानी कौन दे? इस पर प्यासे व्यक्ति द्वारा ये कहना कि "सेठ जी आज आप ही इंसान बन जाइये..."(इंसानियत), "कोई समस्या नही नेताजी हम भी जानते हैं कि चुनाव आ रहे हैं..." (समय का फेर), "ला घड़ी मुझे दे और उन्होंने यह कहकर एक पत्थर उठाया और घड़ी को कूट दिया.. यह ले ससुरी हर माह मुझसे ब्याज खा रही है" (कंजूस बाप), मजबूरी में 100 रुपये का सामान 75 रुपये में देते हुए ये कहना कि " ईमानदारी से तो 100 का ही है बाबूजी परंतु...! कल दीपावली है ना... और बच्चे जिद कर..? मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं साथ ही *कहानी के अंत मे संक्षेपक, प्रश्नवाचक, विस्मयादिबोधक चिन्ह लगा कर भाव विस्तार के पाठकों पर छोड़ देना इस लघुकथा संग्रह में लिखित लघुकथाओं की विशेषता रही है जो कि किसी भी लघुकथा का आवश्यक प्राण होती है।*

       *उद्देश्य-* साहित्य समाज का दर्पण है इसलिए एक साहित्यकार का साहित्यिक धर्म है कि वह अपनी लेखनी के माध्यम से समाज के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं पर समान दृष्टि से अपनी लेखनी का प्रयोग करे।  विश्नोई जी इस धर्म को भी निभाने में बखूबी सफल हुए हैं। उन्होंने एक ओर तो गुलामी, बिस्कुट का पैकेट, कथनी-करनी, दहेज, मजबूरी, गंदी राजनीति, ईमानदारी, रक्षक बना भक्षक, पैसा बोलता है, ममता, कलयुगी राक्षस, नपुंसको की भीड़, सपनों का शहर, अंधेर नगरी, स्टेटस, मौसेरा भाई, डस्टबिन, कवि गोष्ठी और नर्क आदि लघुकथाओं के माध्यम से *समाज में व्याप्त राजनीतिक, पुलिस, प्रशासनिक, साहित्यिक, सामाजिक भ्रष्टाचार, लिंगभेद, बाल अपराध, भिक्षावृत्ति, शराबखोरी, साहूकारी, बेरोजगारी,जाति-धर्मवाद, दहेज प्रथा, शोषण जैसी नकारात्मक कुरीतियों से पाठकों का सीधा साक्षात्कार कराया है*। तो दूसरी ओर लावारिस लाश, सम्बंध, कर्फ़्यू, देशद्रोही, वीरता चक्र, दधीचि, ज्योतिष विज्ञान, स्वार्थी, अपना देश, इंसानियत, फर्ज, अधिकार, नेकी का फल, देव पुरूष, जिंदगी, इंसान तो हूँ, फरिश्ता को लिखकर *राष्ट्रप्रेम, दयाशीलता, दानशीलता, संस्कार, सौहार्द, सहृदयता, ममता, भाईचारा जैसे सकारात्मक बिंदुओं को लेखक समाज के समक्ष प्रस्तुत करने के उद्देश्य में सफल हुआ है* इसके साथ ही पुनर्जन्म, पत्थर, स्वतंत्रता, अतिथि देवो भवः, देश के लिए जैसी रचनाओं में हास्य व्यंग्य उतपन्न कर पुस्तक को नीरसता और उबाऊपन से बचाया है। 

       मुझे आशा ही नही अपितु पूर्ण विश्वास है कि उक्त लघु कहानी संग्रह सुधी पाठकों को 'सपनों का शहर' का दर्शन खुली आँखों से करा पाने में सफल होगी और इसके अध्ययन के उपरांत पाठकगण स्वयं को लाभान्वित महसूस करेंगे। मैं हृदयतल से आदरणीय अशोक विश्नोई जी के लिए बहुत-बहुत बधाईयां और शुभकामनाएं ज्ञापित करता हूँ और भविष्य में ऐसी ही शानदार पुस्तकों की आशा के साथ इनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ।

     

     धन्यवाद!!.....आपका स्नेहाकांक्षी

                           *दुष्यंत 'बाबा'*

                   *पुलिस लाईन, मुरादाबाद।*

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