गीत


साँसो  का  स्पंदन  कहता है

उखड़ा-उखड़ा मन  रहता  है

और आँखों  से  बहता पानी

घर आ  जाओ अब महारानी....


कुमल्ही तुलसी पुकार रही है

आकर  गाय  द्वार   खड़ी  है

मांग  रही   है   भोजन-पानी

घर आ  जाओ अब महारानी....


पुष्प सा कोमल बिस्तर चुभता

काँटे  लगती    सेज     सुहानी

प्राण तुम्ही  हो  तुम  जिंदगानी

घर आ  जाओ अब महारानी....


टँगी  दीवार  जो युगल छवि हैं

आलंबन  करें  उद्दीप्त  तुम्हारा

याद  दिला   सब  बात  पुरानी

घर आ  जाओ अब महारानी....


बिन बच्चों  के  गलियाँ   सूनी

लगती  हैं  सब  कितनी  खूनी

करता नही अब  कोई  शैतानी

घर आ  जाओ अब महारानी....


गुजरा पल था अच्छा कल था

पेड़ से  उतरीं  चिड़ियाँ  कहती

आकर  डालो, हमें दाना-पानी

घर आ  जाओ अब महारानी....


लगता  जीवन  अब  स्वेत पत्र

भटक   रहा     मन    यत्र-तत्र

बहा ने दे यह दरिया का पानी।

घर आ  जाओ अब महारानी....


बादल    आकर   राग   सुनाते

गाकर  हिय   में आग   लगाते

बरस जाओ, बन  बरखा  रानी

घर आ  जाओ अब महारानी....


दीवारें  भी  चुगली   करती  हैं

हमने सुनी हैं सब बातें तुम्हारी

कसमें  झूठी  थीं? या पटरानी

घर आ  जाओ अब महारानी....


आकर मुझको विस्मृत कर दो

आलिंगन  का  स्पर्श  मुझे  दो

फिर से  दोहराओ वही कहानी

घर आ  जाओ अब महारानी....


तुम आकर  मुझको  अंक भरो

जो फीके हो गए  सब रंग  भरो

अब कंठ सूख रहा स्रोतवाहिनी

घर आ  जाओ अब महारानी....


संवाद रहित रहो साया बनकर

मैं  मूक  रहूँ  तुम  सब  समझो

यह आंखों की भाषा अनजानी

घर आ  जाओ अब महारानी....


©दुष्यन्त 'बाबा'

मानसरोवर, मुरादाबाद। 

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