मेघों का परिवार (कविता)


मेघों का भी  मेघालय से कितना अनुपम प्यार है

होते हैं घरवार सभी के इनका भी एक परिवार है

कितनी बेबस थी, बूंद ताप सूर्य का सह न पायी
तुम क्या जानो! ये बिछड़ सिन्धु से कितना रोयी

दिये विदाई  सागर रोया  उसका यह परिवार था
हृदय पाषाण समझ सके न ऐसा गहरा प्यार था

था विक्षिप्त मन सो  नभ में मेघों से मिलन हुआ
मेघों ने भी बढ़कर उसको अपने भर अंक लिया

बनी निराशा आशा फिर एक नया परिवार मिला
जितनी बिछड़ी बूंदे थी उन सबसे भी प्यार मिला

दिल में भर उन्माद उड़ती फिरतीं ये गगन-गगन
उन्मादों से होता था मन कितना मद मस्त मगन

मगर हिमालय के  सौंदर्य ने ऐसा जाल बिछाया
हुईं आकर्षित  बूंदे उस पर अम्बुज रोक न पाया

महत्वकांक्षी मन हो जाये तब कोई रोक न पाता
जैसे घर-घर घूमी त्रिया का चरित्र बच नही पाता

तोड़ा उसने मेघ से नाता और बूंद धरा पर आयी
मां सी ममता मिली उसे जब आकर नदी समाई

बहती सरिता देखी तो हृदय सागर का भी फूटा
पुनर्मिलन सुख देता है यदि बेबस हो कोई छूटा

©पूर्णतः मौलिक
-दुष्यन्त 'बाबा'
पुलिस लाईन, मुरादाबाद।
मो0-9758000057

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