आह! (कविता)

       आह!

शायद! तुम  माली बन न  सकीं

इसलिए मैं सुमन सा खिला नही

मिलता पोषण  मन  के  जल से

वह  पोषण  मुझको  मिला  नही

न सुगन्ध  भरी मन अंतस  में ही

इसलिए पवनों संग  मैं वहा नही

मुझे एक ही मिला  रब से जीवन

कर  दिया नाम तुम्हारे ही अर्पण

फिरभी क्यों सब छूटा सा लगता

सोचो तो अधीर  टूटने  लगता है

एक हूक सी उर  में उठ आती है

आंखों में तिमिर सा छा जाता है

होकर  संचारित रक्त शिराओं में

तन-मन  कम्पित कर  जाता  है

                      -दुष्यंत 'बाबा'

                       पुलिस लाईन, मुरादाबाद।

                       मो0-9758000057

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