छद्म चलचित्र : एक आघात

          साथियों! आज सोशल मीडिया हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गया है। हम प्रत्येक दिन की शुरुआत सुप्रभात/सद्विचार संदेश के साथ करते है जिनका व्यक्ति पर कोई प्रभाव नही पड़ता और सम्बंधित व्यक्ति बिना पढ़े ही उसे हटा देता है परन्तु समाज के यथार्थ में व्याप्त छोटी-छोटी बुराइयों पर कुठाराघात करने का न तो साहस कर पाते है और न ही चर्चा, बल्कि मन ही मन कुंठित रहते है। आज-कल संदेशों के आदान-प्रदान हेतु व्हाट्सएप का प्रचलन भी बहुत अधिक बढ़ गया है। या यूं कहिए कि हमारे जीवन का हिस्सा ही बन गया है। ऐसे में कुछ लोग छद्म संदेश भेजकर इतनी घटिया हरकत कर देते हैं कि व्यक्ति को तत् संदेश से पहुँचने वाले आघात/अपमान से उभरने में बहुत समय लग जाता है। ऐसी ही अपने साथ हुई दो घटनाओं को उल्लेख कर रहा हूँ।

प्रकरण-1
बात उन दिनों की है जब पत्नी अपनी शिक्षा पूर्ण करने के लिए अपने मायके में थी वस्तुतः मैं भी सप्ताह में एक या दो बार ससुराल में चला ही जाता था। एक दिन सासु मां, पत्नी और मैं किसी विषय पर चर्चा में मशगूल थे। छोटे साले साहब को मोबाइल चलाने को बहुत शौक था और उन्होंने मेरा मोबाइल लिया और पासवर्ड पूछकर मोबाइल चलाना शुरू कर दिया। प्रत्येक व्यक्ति अपनी रुचि के अनुसार चीजें खोजता है इसलिए उसने भी व्हाट्सएप ग्रुप में आये एक फुटबॉल मैच का चलचित्र देखना शुरू दिया मैच में जैसे ही खिलाड़ी गोल करता है और बॉल गोलपोस्ट में पहुँचती है तेज आवाज में एक अश्लील चलचित्र चलना शुरू हो जाता जल्दी और हड़बड़ाहट में व्यक्ति किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है अर्थात बहुत समय लग गया बन्द करने में। हम शर्मिंदगी से एक दूसरे का मुंह देख रहे थे। और सासु मां साले साहब चप्पल से प्रसाद दे रहीं थी। महसूस कीजिए कितनी शर्मिंदगी हुई होगी।

प्रकरण-2
एक बार एक वरिष्ठ अधिकारी और मैं आमने-सामने बैठकर एक मुख्यमंत्री जी के कार्यक्रम हेतु प्रस्तुति तैयार कर रहे थे। बात बरसात के मौसम की है आये दिन उत्तराखंड में विभिन्न स्थानों पर बादल फटने की घटनाएं हो रही थी वस्तुतः ऐसी घटनाओं के वीडियो जब व्हाट्सएप पर आते है। तो संवेदनाओ के कारण उसे देखने के लिए हमारी उत्सुकता अधिक बढ़ जाती है। व्हाट्सएप वेब के द्वारा अपना व्हाट्सएप साहब के कम्प्यूटर पर खोल लिया था। अचानक ग्रुप में एक छद्म चलचित्र आ गया जिसका शीर्षक था 'उत्तराखंड में भयंकर तबाही का मंजर' उत्सुकतावश अचानक साहब ने चलचित्र चल दिया। प्रारंभ तो बिल्कुल वैसे ही तेज हवाओं के झोंके और अचानक विशालकाय होर्डिंग का सड़क पर गिरना फिर से वही तेज आवाज में अश्लील चलचित्र का चल जाना। हम एक-दूसरे से नजर नही मिला पा रहे थे। अंत मे साहब ने दबी जुबान में कहा ये क्या बदतमीज़ी है। कैसे लोगों से जुड़े रहते हो! मैं निरुत्तर था।
       इन दो घटनाओं ने मुझे अंदर तक झकझोर कर रख दिया। मैं समझता हूँ जितने भी लोग मोबाइल पर इंटरनेट का प्रयोग करते हैं उन्होंने किसी न किसी रूप में इस परेशानी को महसूस अवश्य किया होगा। ऐसे संदेश घर में कभी भी चल सकते है जिसके लिए जागरूक होने की आवश्यकता है। मेरा इन घटनाओं को बताने का केवल इतना उद्देश्य है कि हम ऐसी घटनाओं पर हम अपनी निजता के कारण पर्दा डाल देते हैं किंतु हमें ऐसी घटनाओं पर चुप नही रहना चाहिए बल्कि आवाज उठानी चाहिए। सूचना और प्रौद्योगिकी विभाग को इसके निराकरण के लिए प्रभावी कदम उठाने चाहिए।
      ©दुष्यंत 'बाबा'
      पुलिस लाईन, मुरादाबाद।
      मो0-9758000057

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