आज पुरानी मिल गई (शानदार होली कविता)
आज पुरानी मिल गई (कविता)
है! बहुत मजे की बात, कि आज पुरानी मिल गई
बिना मिले की आस, हमे वो नजरों से ही रंग गई
कहाँ न फिरते मारे-मारे, हम गलियां ओर चौबारे
लिए गोद मे आज सयानी, बीच राह में मिल गई
नखरे मर गए मीत नही, पहले वाली रीत नही है
बोलो तो इठलाती नही है, उसी ढाल में ढल गई
हम भी तो बेचैन हो गए,कुछ प्यासे नैना कर गई
पहुंचे घर में पीछे-पीछे,समझे अब दाल गल गई
अंदर आंगन बैठे साजन,करके सत्कार चली गई
देकर गुजिया हाथ हमारे, प्यार से भैया कह गई
हाय होली के ख्वाब सजाए, पानी-पानी कर गई
जिस बच्ची को बेटी कहते, वो ही मामा कह गई
-दुष्यंत 'बाबा'
पुलिस लाईन, मुरादाबाद।
मो0-9758000057
दुष्यंत बाबा तुम्हारी कविता हमारे मन को भा गई
जवाब देंहटाएंधन्यवाद शिवेंद्र भाई🙏
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