एक और द्रोपदी (एक लघुकथा)

        आज खुशी-खुशी दो दिन के अवकाश पर गांव के लिए निकला था कि गांव के बाहर मुख्य मार्ग पर गाड़ी रोकी सोचा, कि घर जा रहा हूं तो खाली हाथ नहीं जाना चाहिए। सो एक ठेले पर पहुंचा जहां एक युवती बहुत ही गंदे कपड़ों में फल बेच रही थी। मैं जैसे ही फल लेने उसके पास पहुंचा कि वह मुझे एक टक देखती रही, मानो जैसे वह मुझे पहले से जानती हो। आंखों में आंसू लिए वह ठेला छोड़कर चली गयी। पड़ोस के नल पर  मुँह धुलकर वह एक नई नई ऊर्जा के साथ वापस आ गई।

     मैने उससे पूछा कि "क्या तुम मुझे जानती हो ?"
         "हाँ! मैं तुम्हें जानती हूँ तुम्हारा नाम राजन है" उसने उत्तर दिया ।
         मैंने उससे पुनः पूछा कि "तुम्हारा क्या नाम है"
         "मेरा नाम आशा है तुम्हारे मित्र डैनी. नी. नी...।"
कहते हुए वह तेजी से रो पड़ी।
इतना सुनते ही मेरा माथा कौंध गया सारा वृतांत याद आ गया।   
         बात उस समय की थी जब आस-पास के गांव से सभी बच्चे इसी बस स्टैंड पर इकट्ठा होते थे। और वहाँ से बस द्वारा स्कूल जाते थे। इसी तरह एकदिन सभी बच्चे स्कूल जाने के लिए बस पर सवार हुए थे, तभी मेरे एक मित्र डैनी ने इसी आशा के पैर पर जानबूझकर पैर रख दिया था।
         आशा ने दर्द से चीखते हुए कहा कि "अंधे हो! तुम्हें दिखता नहीं है"
         "हां.. दिखता है इतनी लाटसाहबनी है तो अपने बाप की बस से आती" डैनी ने आशा को उत्तर दिया।
         "तू! मुझे जनता नही है" आशा ने उच्च स्वर में कहा।
         "हाँ! जानता हूँ मंगलिया भंगी की है और क्या कलेक्टर की है" डैनी ने उत्तर दिया।
         सहेलियों के बीच इतना सुनते ही वह शर्म से पानी-पानी हो गयी और अपनी मदद के लिए सभी और देखने लगी। परन्तु कोई उसकी मदद को आगे नही बढ़ा। ये देख डैनी का मनोबल ओर भी बढ़ गया वह यहीं न रुका।
      उसने आवाज दी "संजय! बस रोक..इसे यहीं उतार दे"
        चूंकि संजय (बस का ड्राइवर) डैनी के गुट से डरता था। उसने आशा को वहीं उतार दिया। वह उदास नजरों से बस को आखरी बिंदु तक निहारती रही। मानो यह उसकी जिंदगी की अंतिम बस थी। शायद आज उसे मनुष्य जाति से नफरत हो गयी हो। फिर कभी आशा की कोई खबर मुझे न मिली।
        परन्तु आज वह द्रोपदी सा ओज लिए मेरे सामने खड़ी थी और मैं उसके सामने कर्ण की तरह मूक लज्जित खड़ा था क्योंकि उसकी इस दशा के लिए मैं भी जिम्मेदार था मुझे ज्ञात हुआ कि उसके साथ की लगभग सभी लड़कियां 68500 शिक्षक भर्ती में शिक्षक हो गयीं थी। वह आज भी अविवाहित और निर्वासित जीवन जी रही थी। क्योंकि भरी बस में द्रौपदी की भांति उसके होते चीरहरण का कोई विरोध न कर सका इसलिए उसे आदमी जाति से नफरत हो गयी थी।
        @पूर्णतः स्वरचित
         -दुष्यंत 'बाबा'
         पुलिस लाइन, मुरादाबाद।
         (पूर्णतः मौलिक)

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